काशी में मसान होली का अद्भुत नजारा, 3 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे

धार्मिक नगरी वाराणसी में इस वर्ष भी परंपरागत अंदाज में मसान होली मनाई गई। मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर जलती चिताओं की भस्म से साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने होली खेली। डमरू की गूंज, शंखनाद और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से पूरा घाट क्षेत्र गूंज उठा।

भस्म से खेली होली, दिखा अनोखा रूप

सुबह से ही घाटों पर साधु-संन्यासियों की भीड़ उमड़ने लगी। कई नागा साधु भस्म लपेटे, सिर पर जटा और हाथों में डमरू लिए नजर आए। कुछ संन्यासी पारंपरिक नरमुंड धारण किए हुए थे, जबकि कई विदेशी श्रद्धालु भी इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचे। जलती चिताओं की राख को श्रद्धा के साथ एक-दूसरे पर लगाया गया।

आस्था और दर्शन का संगम

मसान होली को भगवान शिव से जुड़ी परंपरा माना जाता है। मान्यता है कि काशी में शिव स्वयं श्मशान में वास करते हैं, इसलिए यहां भस्म से होली खेलने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह उत्सव जीवन और मृत्यु के दर्शन को दर्शाता है और संदेश देता है कि अंततः सब कुछ भस्म में ही मिल जाता है।


भारी भीड़, कड़ी सुरक्षा

प्रशासन के अनुसार, इस आयोजन को देखने के लिए करीब 3 लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक वाराणसी पहुंचे। घाटों और आसपास के इलाकों में पुलिस बल तैनात किया गया था। ड्रोन कैमरों से निगरानी की गई और भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष इंतजाम किए गए।

पर्यटन को बढ़ावा

इस अनोखी होली ने देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित किया। होटल, गेस्ट हाउस और घाट क्षेत्र में चहल-पहल बनी रही। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि इस आयोजन से पर्यटन और व्यापार को भी बढ़ावा मिला है।काशी की यह मसान होली हर वर्ष आस्था, परंपरा और अनोखे रंगों के कारण देशभर में चर्चा का विषय बनती है।


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