गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 : भोजपुरी की उपेक्षा पर अभिनेता अंजन श्रीवास्तव ने जताई पीड़ा

छावनी स्थित एक होटल साहित्य, संस्कृति और गिरमिटिया विरासत की थीम पर गाजीपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2025 का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर चर्चित अभिनेता अंजन श्रीवास्तव (वागले की दुनिया, चाइनागेट, घातक) ने भोजपुरी भाषा और सिनेमा की उपेक्षा को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की।उन्होंने कहा — “मुंबई में गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के फिल्म फेस्टिवल होते हैं, लेकिन भोजपुरी पर कभी कुछ नहीं होता। ऐसा इसलिए कि भोजपुरी को बहुत निचले दर्जे का समझा जाता है।”गाजीपुर जिले के गहमर निवासी अंजन श्रीवास्तव ने कहा कि बॉलीवुड में भोजपुरी पर बेहतर और सार्थक काम होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था चलाने के लिए उन्हें कोलकाता जाना पड़ा — “तब समझ में आया कि लोग बाहर पलायन क्यों करते हैं। आज तक कोई जमींदार नहीं गया, हमेशा पूर्वांचल के गरीब ही पलायन करते हैं।”पैनल चर्चा के दौरान लेखिका नीरजा माधव ने कहा कि बनारस और गाजीपुर मुखौटा पहनने वाले शहर नहीं हैं। “हर शहर का अपना स्वभाव होता है — मुंबई में माया हावी है, जबकि बनारस में अक्खड़ता।

घाट पर गमछा पहने व्यक्ति गुमटी वाला भी हो सकता है या खरबपति भी, ये बताना मुश्किल है।”लेखक मृत्युंजय सिंह ने कहा कि कोलकाता की टैक्सियों में भोजपुरी गीत बजने पर लोग भोजपुरी को निम्न स्तर का समझने की भूल करते हैं। वहीं भोजपुरी साहित्य के प्रतिनिधि मनोज भावुक ने कहा कि जड़ों से जुड़े रहना ही भोजपुरी की असली ताकत है — “मॉरीशस और फिजी में बसे लोगों ने भोजपुरी को बचाए रखा, लेकिन हम अपने ही देश में इसे भूलते जा रहे बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित चतुर्वेदी ने कहा कि “चुनावों में जाति आधारित आकलन पूरे देश में होता है, लेकिन गाजीपुर-बलिया को ही जातिवादी कहा जाता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि समान मापदंड हर जगह लागू हो। देश को आज फिर एक जयप्रकाश नारायण की जरूरत है।”उद्घाटन सत्र में दक्षिण अफ्रीका में भारत के हाई कमिश्नर प्रो. अनिल सूकलाल, सांस्कृतिक सलाहकार व कवि जोलानी म्किवा, गयाना हाई कमीशन के डिप्लोमैट केशव तिवारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि मैट सिडेलो और कामिला यूनीक, गिरमिटिया कलाकार राज मोहन और रेमोन भगवानदीन, तथा दक्षिण अफ्रीका से आईं निलिस्त्रा सूकलाल उपस्थित रहीं।सभी अतिथियों ने भोजपुरी भाषा से जुड़ाव और अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा पर बल दिया।



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