महामना महोत्सव में आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण का उद्बोधन, युवाओं का रुझान अयोध्या–काशी की ओर बढ़ना सकारात्मक संकेत

महामना मदन मोहन मालवीय के विचार, आदर्श और चरित्रनिष्ठ जीवन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा आयोजित महामना महोत्सव में आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने युवाओं को देश का भविष्य बताते हुए उनके चरित्र, संस्कार और मूल्यबोध पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि महामना का जीवन आज भी समाज और राष्ट्र के लिए मार्गदर्शक है।आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि महामना महोत्सव का उद्देश्य महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा प्रतिपादित मूल्यनिष्ठ, समाजहितकारी और अनुशासित जीवन-दृष्टि से युवाओं को परिचित कराना है। यह आयोजन महामना पर कोई उपकार नहीं, बल्कि समाज और किशोर-युवा पीढ़ी के प्रति दायित्व है, ताकि वे उनके जीवन से प्रेरणा लेकर सार्थक और उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकें।

उन्होंने कहा कि युवा इस देश का भविष्य हैं। जिन युवाओं में चरित्र, संस्कार और मूल्यबोध होगा, वही राष्ट्र को सही दिशा दे सकते हैं। महामना के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और ऐसे आयोजन युवाओं के भीतर छिपी चेतना को जागृत करने का कार्य करते हैं।युवाओं में नए कैलेंडर के जश्न को लेकर बोलते हुए आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि यह ‘नया वर्ष’ नहीं बल्कि ‘नया कैलेंडर’ है, जिसे औपनिवेशिक प्रभाव के कारण अपनाया गया। इसके बावजूद यह एक अच्छा संकेत है कि युवा वर्ग अब गोवा या भोग-विलास के केंद्रों की बजाय अयोध्या और काशी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों की ओर आकर्षित हो रहा है। यह सनातन परंपरा और अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रमाण है।

पीडीए कैलेंडर और विभिन्न पंचांगों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत में कालबोध की परंपरा अत्यंत प्राचीन और विविध रही है। काशी से निकलने वाले पंचांगों में फसली, हिजरी और शक संवत का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग समूहों द्वारा कैलेंडर जारी करना नया नहीं है, लेकिन यह समय तय करेगा कि कौन-सी परंपरा अपनी कसौटी पर टिक पाती है।काशी के स्वभाव पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया काशी के अल्हड़पन से डरती है। अन्य शहरों में लोग शव देखकर दूर भागते हैं, जबकि काशी में लोग शवों के बीच से सहजता से निकल जाते हैं। यही आनंद की परिभाषा है। उन्होंने इसे शिव के विवाह प्रसंग से जोड़ते हुए कहा कि जैसे शिव को दूल्हा देखकर घराती भाग जाते हैं, वैसे ही काशी का यह स्वरूप बाहरी लोगों को चकित कर देता है। यही काशी की आत्मा और आनंद का भाव है।



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