शिमला में किसान-बागवानों का सचिवालय घेराव, ट्रैफिक ठप, FTA और जमीन नीति को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन

हिमाचल प्रदेश के सैकड़ों किसान और बागवान सोमवार को सचिवालय के घेराव के लिए छोटा शिमला पहुंचे। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों के जुटने से सचिवालय और आसपास के इलाकों में ट्रैफिक पूरी तरह ठप हो गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने सचिवालय की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग कर रखी है। प्रदर्शनकारी केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी कर रहे हैं।प्रदेश के अलग-अलग जिलों से शिमला पहुंचे किसान-बागवान न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने के फैसले का विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही वे सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार भूमिहीन किसानों को जमीन देने के लिए सरकार से ठोस नीति बनाने की मांग कर रहे हैं।

दरअसल, केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) किया है। बागवानों का कहना है कि इस समझौते से हिमाचल प्रदेश के ढाई लाख से ज्यादा सेब उत्पादकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका आरोप है कि न्यूजीलैंड के बहाने दूसरे देश भी सेब पर आयात शुल्क घटाने का दबाव बनाएंगे। इसके अलावा अमेरिका समेत अन्य देशों के साथ भी FTA पर विचार किए जाने से बागवानों में भारी नाराजगी है।किसानों और बागवानों का दावा है कि आयातित सेब देश के बाजारों में आने से हिमाचल का करीब 5500 करोड़ रुपये का सेब उद्योग बुरी तरह प्रभावित होगा। साथ ही जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड का सेब उद्योग भी संकट में आ जाएगा।

‘FTA के जरिए खेती को उजाड़ने की तैयारी’

सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष सोहन ठाकुर ने आरोप लगाया कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार FTA के जरिए देश की खेती को विदेशी बाजारों के हवाले कर रही है। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड, अमेरिका और अन्य देशों से सस्ते सेब के आयात ने हिमाचल के बागवानों की कमर तोड़ दी है। आयात शुल्क घटाकर घरेलू उत्पादकों को बर्बादी की कगार पर पहुंचाया जा रहा है, जबकि उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से बागवानों को सड़कों पर उतरना पड़ा है।

जमीन नीति न बनाने का आरोप

किसान नेता संजय चौहान ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना का आरोप लगाते हुए कहा कि कोर्ट के आदेशों के बावजूद भूमिहीन किसानों को जमीन देने के लिए अब तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में जमीन की बेतरतीब बिक्री, सेब के पेड़ों की कटाई और बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर किसानों को बेदखल किया जा रहा है। पावर प्रोजेक्ट, फोरलेन और नेशनल हाईवे से प्रभावित किसान आज भी मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द मांगों पर भरोसा नहीं दिया तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।



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