गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ की ओर से गोरखनाथ मंदिर परिसर में मकर संक्रांति से माह भर तक चलने वाले प्रसिद्ध खिचड़ी मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला उत्तर भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शुमार है, जिसमें उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार, नेपाल और नाथपंथ को मानने वाले अन्य राज्यों व देशों से लाखों श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और सुविधाओं की तैयारियां पहले से ही शुरू कर दी जाती हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो स्वयं गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं, अपने हर गोरखपुर दौरे के दौरान प्रशासन, पुलिस और नगर निगम के अधिकारियों के साथ खिचड़ी मेले की तैयारियों की समीक्षा करते रहे हैं और आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए हैं।
खिचड़ी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि अन्न के अनुष्ठान का महापर्व भी माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन इसका चरम होता है, जब बाबा गोरखनाथ को अन्न के रूप में चावल और दाल की मानो बरसात होती है। इसके बाद यह सिलसिला लगभग एक महीने तक चलता है। खासकर शनिवार, मंगलवार और छुट्टियों के दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ अन्न का चढ़ावा भी कई गुना बढ़ जाता है।मंदिर में चढ़ाए गए अन्न के हर दाने का गोरक्षपीठ की ओर से सुनियोजित तरीके से सदुपयोग किया जाता है। पूरे आयोजन के दौरान एकत्र किए गए अन्न की विशेष प्रक्रिया के तहत तीन चरणों में ग्रेडिंग की जाती है। पहले बड़े छेद वाली छननी से इसे गुजारा जाता है, जिससे आलू और हल्दी जैसी बड़ी वस्तुएं अलग हो जाती हैं। इसके बाद महीन छननी से चावल और दाल को अलग किया जाता है।
अंत में सूप से फटक कर बचे हुए अन्न को भी साफ किया जाता है।इस पूरी प्रक्रिया में मंदिर परिसर में कार्यरत कर्मचारी और उनके परिवार की महिलाएं अहम भूमिका निभाती हैं। इस तरह तैयार किया गया चावल और दाल पूरे साल लाखों लोगों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इसका उपयोग मंदिर के नियमित भंडारे में सुबह और शाम के भोजन के लिए होता है। इसके अलावा यह अन्न जरूरतमंदों की शादी-ब्याह, वनवासी आश्रमों, दृष्टिहीन विद्यालयों और अन्य सामाजिक संस्थाओं को भी उपलब्ध कराया जाता है।गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला इस तरह आस्था के साथ-साथ सेवा, सदुपयोग और सामाजिक सहयोग का भी अनुपम उदाहरण पेश करता है।


