आईआईटी (बीएचयू) के धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने इस्पात उद्योग को पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया के नेतृत्व में किए गए इस शोध में हरे नारियल के छिलके से तैयार बायोचार को लौह निर्माण प्रक्रियाओं में अपचायक (रिड्यूसिंग एजेंट) के रूप में सफलतापूर्वक परखा गया है।इस्पात उद्योग वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का बड़ा स्रोत माना जाता है। प्रो. गिरिजा के अनुसार, दुनिया भर में इस्पात उद्योग कुल CO₂ उत्सर्जन में लगभग 7 प्रतिशत और भारत में करीब 12 प्रतिशत योगदान देता है।
भारत ने वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में 20 प्रतिशत कटौती और 2070 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य तय किया है। ऐसे में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना समय की बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। आईआईटी (बीएचयू) का यह शोध इसी दिशा में एक ठोस और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है।शोध में बताया गया कि भारत विश्व का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है। हर साल करोड़ों नारियलों से निकलने वाला छिलका और भूसी अब तक बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग में नहीं आ पा रहा था। वैज्ञानिकों ने इसी कृषि अपशिष्ट को संसाधित कर ‘ग्रीन कोकोनट हस्क बायोचार’ (GCB) तैयार किया और इसे लौह प्रगलन प्रक्रियाओं में प्रयोग किया।प्रयोगों के दौरान पाया गया कि शुरुआती 60 मिनट में बायोचार की अपचयन दर काफी तेज़ रही, जिससे उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता बढ़ सकती है।
इसके अलावा, इसमें राख और सल्फर की मात्रा पारंपरिक कोयले की तुलना में काफी कम है। इससे स्पंज आयरन की गुणवत्ता बेहतर होती है और स्लैग निर्माण में भी कमी आती है।वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बायोचार पूर्णतः नवीकरणीय स्रोत से प्राप्त होता है और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने के कारण परिवहन लागत भी कम करता है। साथ ही, इससे पर्यावरणीय प्रभाव घटता है और इस्पात उद्योग को हरित प्रौद्योगिकी की ओर बढ़ने में मदद मिलती है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर अपनाया जाता है, तो यह न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में सहायक होगी, बल्कि कृषि अपशिष्ट के प्रभावी उपयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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