पार्श्वनाथ विद्यापीठ में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, जैन दर्शन से समकालीन शिक्षा में नैतिक और सामाजिक रूपांतरण पर जोर

भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR), नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित "प्रायोगिक प्राचीन प्रज्ञाः शिक्षा के रूपांतरण हेतु जैन दर्शन" विषयक त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी में विधिवत उद्घाटन हुआ। यह संगोष्ठी 20 से 22 जनवरी 2026 तक चली और इसे InSIS – इंडियन सोसाइटी फॉर इंडिक स्टडीज़ तथा DRPSECT, वडोदरा के सहयोग से आयोजित किया गया।संगोष्ठी का उद्देश्य शिक्षा, नैतिकता, नेतृत्व, पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े समकालीन मुद्दों में जैन दर्शन की प्रायोगिक प्रासंगिकता को उजागर करना है। उद्घाटन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन और मंगलाचरण से हुई, जिसके बाद संगोष्ठी निदेशक प्रो. रमानाथ पाण्डेय ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन के मूल सिद्धांत—अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और स्याद्वाद—समकालीन शिक्षा को नैतिक, मूल्याधारित और समाजोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

उद्घाटन भाषण में प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी, निदेशक, IIAS शिमला ने जैन दर्शन को बहुलतावाद, संवाद, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और न्यूनतावादी जीवन-दृष्टि को बढ़ावा देने वाली सशक्त बौद्धिक परंपरा बताया। संस्थागत संरक्षक सुदेव बरार ने विद्यापीठ की नैतिक शिक्षा और अंतर्विषयी शोध में दीर्घकालिक प्रतिबद्धता पर जोर दिया। वहीं, प्रो. पी. बी. शर्मा, कुलपति, एमिटी विश्वविद्यालय, गुरुग्राम ने उच्च शिक्षा में कौशल के साथ चरित्र-निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व को जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।उद्घाटन सत्र में संगोष्ठी स्मारिका का विमोचन भी किया गया। संगोष्ठी में “समकालीन शिक्षा में जैन दर्शन की प्रासंगिकता” विषयक पैनल चर्चा भी आयोजित हुई, जिसका नेतृत्व प्रो. रामनाथ पाण्डेय ने किया। पैनल में शिक्षा में नैतिक क्षरण, मानसिक तनाव, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियों पर गंभीर चर्चा हुई।

संगोष्ठी में निष्कर्ष निकाला गया कि जैन दर्शन न केवल प्राचीन ज्ञानमीमांसा और नैतिक मूल्य प्रदान करता है, बल्कि समकालीन शिक्षा को सामाजिक उत्तरदायित्व, सतत विकास और नैतिक नेतृत्व की दिशा में भी मार्गदर्शन करता है। संगोष्ठी ने शिक्षक और प्रशासनिक व्यक्तियों को संयमित, शिक्षित और उत्तरदायी बनाने के महत्व को भी रेखांकित किया।त्रिदिवसीय संगोष्ठी ने शिक्षा और दर्शन के समन्वय के माध्यम से नैतिक, मानवीय और नीतिगत रूपांतरण के लिए मजबूत आधारशिला रखी।



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