स्कूली शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव के संकेत देते हुए केंद्र सरकार समग्र शिक्षा अभियान के नए चरण की शुरुआत करने जा रही है। इसके तहत स्कूलों के संचालन की पूरी जिम्मेदारी समाज को सौंपने की तैयारी है, जबकि सरकार की भूमिका वेतन और आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने तक सीमित रहेगी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को इस नई पहल का खाका पेश करते हुए राज्यों से सुझाव भी मांगे हैं।यह पहल ऐसे समय में की गई है, जब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के लागू होने के पांच साल पूरे हो चुके हैं और समग्र शिक्षा अभियान का मौजूदा चरण 31 मार्च 2026 को समाप्त होने वाला है।
केंद्र सरकार का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में इस अभियान के जरिए स्कूली शिक्षा के बुनियादी ढांचे और गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन अब सीखने के स्तर (लर्निंग आउटकम) में अपेक्षित वृद्धि, परीक्षा के बोझ को कम करने और कक्षा 12 तक शत-प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात हासिल करने के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।इसी सोच के तहत शिक्षा मंत्रालय ने स्कूल संचालन की मौजूदा व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव का निर्णय लिया है। प्रस्तावित मसौदे के अनुसार, स्कूलों के संचालन के लिए समाज के प्रबुद्ध वर्गों की समितियां गठित की जा सकती हैं, जिनमें शिक्षाविद, अभिभावक, स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे। ये समितियां स्कूलों के प्रबंधन, निगरानी और शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी।
सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए शिक्षा को समाज-आधारित बनाया जाए, ताकि स्कूल केवल सरकारी व्यवस्था न रहकर सामूहिक जिम्मेदारी बनें। मंत्रालय का मानना है कि इस मॉडल से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ जवाबदेही और नवाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।अब केंद्र सरकार राज्यों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर इस मसौदे को अंतिम रूप देगी। इसके बाद समग्र शिक्षा अभियान के नए चरण को लागू किया जाएगा, जिसे स्कूली शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े सुधार के रूप में देखा जा रहा है।


