बनारस लिट् फेस्ट–4 के दूसरे दिन शनिवार को ज्ञान गंगा सभागार स्थित दरबार हाल में आयोजित परिचर्चा “साहित्य, कला और समाज : बदलते संबंधों की पड़ताल” विचार, विमर्श और विवेकपूर्ण तर्कों का सजीव मंच बन गई। इस अवसर पर देश के प्रमुख साहित्यकारों, कथाकारों और बुद्धिजीवियों ने समकालीन समाज के बदलते स्वरूप में साहित्य, शिक्षा और कला की भूमिका पर गहन मंथन किया। परिचर्चा के दौरान न्यू इंडिया की अवधारणा के औचित्य पर सवाल उठाते हुए समाज से साहित्य, शिक्षा और कलाकार के अटूट संबंधों को रेखांकित किया गया।परिचर्चा की शुरुआत लेखक एवं आलोचक विकास कुमार झा ने की। उन्होंने अपनी बातों को एक ट्रेन यात्रा के अनुभव से जोड़ते हुए कहा कि बाज़ारवाद से वर्तमान समाज को बचाने और मानवीय मूल्यों को संजोने का कार्य साहित्य और कला ही कर सकती है। उन्होंने सभागार में युवाओं की बड़ी उपस्थिति को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और इसे आशा का संकेत बताया।
सत्र में प्रसिद्ध कवि एवं निबंधकार उदयन बाजपेयी ने कहा कि साहित्य मनुष्य के उस अंतस को छूता है, जो कभी नहीं बदलता। उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव के बीच भी कुछ मूल्य स्थायी रहते हैं, जिसका उदाहरण महाकवि कालिदास की रचनाएं हैं। उन्होंने शिक्षा बजट में मात्र दो प्रतिशत हिस्सेदारी पर चिंता व्यक्त की और न्यू इंडिया की अवधारणा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आज फैशन और राजनीति की इंडस्ट्री समाज को एकरूप बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे विविधता और मौलिकता समाप्त हो रही है। उन्होंने कैंसर का उदाहरण देते हुए कहा कि समाज को इस स्थिति से बचाने का कार्य केवल साहित्य और कला ही कर सकती है।कथाकार अशोक ने वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन परिवर्तनों के चलते साहित्य और कला के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि आज वह लगाव और समझ कम होती जा रही है, जो पहले देखने को मिलती थी। इसके बावजूद साहित्य आज भी जीवन को समझने और दिशा देने का कार्य करता है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक पंकज चतुर्वेदी ने साहित्य को प्रकृति से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया और युवाओं को कालिदास जैसे क्लासिक साहित्यकारों को पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि साहित्य किसी विनाश को रोकने की गारंटी नहीं देता, लेकिन वह उसका साक्षी बन सकता है, उसके कारणों को चिन्हित कर सकता है। साहित्य उन्हीं को बदल सकता है, जो बदलाव के लिए तैयार हों। उन्होंने न्यू इंडिया की अवधारणा पर विचार रखते हुए कहा कि क्या वह भारत, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और महात्मा गांधी के सपनों से अलग होगा? उन्होंने न्यू इंडिया के मूल्यों—सत्य, अहिंसा और करुणा—पर प्रश्न उठाए और कवि कुंवर नारायण की कविता की पंक्तियां पढ़कर अपनी बात को और प्रभावी बनाया।प्रसिद्ध हिंदी कवयित्री, कथाकार और उपन्यासकार ममता कालिया ने कहा कि भारतीय समाज परंपरा और नवीनता दोनों को साथ लेकर चलता है। उन्होंने साहित्य को बदलते मानवीय संबंधों का दर्पण बताया और कलाकार की दुनिया को रंगरेज़ की दुनिया की संज्ञा दी। उनके अनुसार भारत निरंतरता में विश्वास करता है—पुरानी परंपराएं भी हमारे साथ हैं और नई परंपराएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।परिचर्चा का सशक्त और संतुलित संचालन इरफान द्वारा किया गया। सत्र में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, छात्र और युवा उपस्थित रहे, जिन्होंने विचार-विमर्श को गंभीरता से सुना और सराहा।


