राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी वर्षगांठ नहीं मनाता, बल्कि आत्मावलोकन करता है कि जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, वे कितने प्राप्त हुए। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर डीएवी पीजी कॉलेज में आयोजित ‘पंच परिवर्तन एवं भविष्य का भारत’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय समन्वयक जे. नंद कुमार ने मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।आईसीएसएसआर, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी में जे. नंद कुमार ने कहा कि यह शताब्दी केवल एक संगठन के सौ वर्ष पूरे होने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का साक्षी बन रही है। उन्होंने इसे नवोत्थान और प्रतिमान परिवर्तन का क्षण बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है और आगे भी रहेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साउथ एशिया विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट प्रो. के.के. अग्रवाल ने कहा कि पंच परिवर्तन केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संघ के सिद्धांतों को समेकित करने का मूलमंत्र है। यदि भारत को विश्वगुरु बनाना है तो संघ के विचारों को आत्मसात करना होगा। पंच परिवर्तन का सिद्धांत नया नहीं है, बस इसे अब तक ठीक ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया। यह हमारी सोच को संकुचित नहीं बल्कि वैश्विक बनाता है।कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के प्रबंधक अजीत सिंह यादव ने स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर किया। स्वागत भाषण डॉ. पारुल जैन, विषय स्थापना डॉ. शान्तनु सौरभ तथा धन्यवाद ज्ञापन कार्यवाहक प्राचार्य प्रो. मिश्रीलाल ने दिया।इस अवसर पर रामाशीष जी, प्रो. पी.के. मिश्रा, प्रो. एच.के. सिंह, प्रो. टी.पी. सिंह, प्रो. राजाराम यादव, प्रो. बिहारी लाल शर्मा, प्रो. संगीता जैन एवं प्रो. राहुल सहित अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे। संगोष्ठी का संयोजन डॉ. शान्तनु सौरभ तथा सह-संयोजन डॉ. सिद्धार्थ सिंह ने किया।
