बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रशासन पर पिछले दो दशकों से अवैध नियमों के आधार पर शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का गंभीर आरोप लगाया गया है। डॉ. ओम शंकर द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम 1964 और केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1965 को बीएचयू की कार्यकारी परिषद ने कभी लागू ही नहीं किया, फिर भी इन्हीं नियमों के आधार पर विश्वविद्यालय में अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती रही। कहा गया है कि सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी के अनुसार बीएचयू प्रशासन कार्यकारी परिषद का ऐसा कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके माध्यम से इन नियमों को विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों पर लागू किया गया हो। आरोप लगाया गया है कि 13 जुलाई 2007 को तत्कालीन रजिस्ट्रार द्वारा जारी एक पत्र के आधार पर इन नियमों को लागू मानकर कार्रवाई की जाती रही।
डॉ. ओम शंकर के अनुसार इस कथित प्रक्रिया के चलते पिछले 20 वर्षों में 500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों को निलंबन, निष्कासन या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि यह कदम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शैक्षणिक स्वायत्तता के विरुद्ध है। विश्वविद्यालय के कुलपति, कुलसचिव और अन्य अधिकारियों से एक सप्ताह के भीतर पद से इस्तीफा देने और सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की गई है। साथ ही पिछले वर्षों में की गई सभी अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा कर उन्हें निरस्त करने की भी मांग की गई है।

