‘बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल’ पुस्तक पर हुई परिचर्चा, वक्ताओं ने बताया प्रेरक दस्तावेज

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य एवं वरिष्ठ कवि प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के 61वें जन्मदिन के अवसर पर उन पर केंद्रित संस्मरण पुस्तक ‘बनारस, बीएचयू और श्रीप्रकाश शुक्ल’ के लोकार्पण सह परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन रामछाटपार शिल्पन्यास, वाराणसी के तत्वावधान में हुआ। पुस्तक का संपादन डॉ. आर्यपुत्र दीपक और अक्षत पांडेय ने संयुक्त रूप से किया है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने बनारस और बीएचयू को हिंदी के व्यापक संसार से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने कहा कि बीएचयू में पिछले दो दशकों में उन्होंने रचनात्मक युवाओं की एक ऊर्जावान टीम तैयार की, जो आज साहित्य जगत में सम्मानित पहचान रखती है।

आत्मवक्तव्य में प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि पुस्तक लेखन व्यक्ति को समझ देता है और उस पर होने वाली चर्चाएं उसे गति प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल स्मृति की नहीं, बल्कि उम्मीद और जिम्मेदारी का एहसास कराने वाली पुस्तक है।विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध चिकित्सक प्रो. विजयनाथ मिश्र ने कहा कि श्रीप्रकाश शुक्ल अब पूरी तरह बनारसी हो चुके हैं और आलोचकों को भी स्नेह देने की उनकी प्रवृत्ति उन्हें विशेष बनाती है।पत्रिका ‘अभिनव कदम’ के संपादक डॉ. जयप्रकाश धूमकेतु ने पुस्तक को श्रीप्रकाश शुक्ल के व्यक्तित्व और रचनात्मक विकास का जीवंत दस्तावेज बताया। वहीं आईआईटी बीएचयू के प्रो. राकेश कुमार मिश्र ने कहा कि पुस्तक में उनके विचार, कर्म और लेखन की गंभीर पहचान की गई है।इस अवसर पर प्रयाग विश्वविद्यालय के डॉ. शिवकुमार यादव, डॉ. विभा शंकर तथा अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। लेखक की पुत्री और जेएनयू शोधार्थी दर्शिता शुक्ल ने अपने पिता से जुड़े रोचक संस्मरण साझा किए।कार्यक्रम का संचालन डॉ. विन्ध्याचल यादव ने किया। स्वागत डॉ. आर्यपुत्र दीपक तथा धन्यवाद ज्ञापन अक्षत पांडेय ने किया। कार्यक्रम में शहर के अनेक साहित्यकार, शिक्षक और छात्र उपस्थित रहे।




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