काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य रामचंद्र शुक्ल सभागार में प्रतिष्ठित कवि, आलोचक एवं गद्यकार प्रो. प्रकाश शुक्ल की पुस्तक ‘प्रकाश शुक्ल-चुनी हुई रचनाएं’ का लोकार्पण सह परिचर्चा आयोजित हुआ। इस संकलन का संपादन विख्यात आलोचक व कोशकार प्रो. कमलेश वर्मा ने किया है, जिसमें शुक्ल की अब तक प्रकाशित 16 पुस्तकों से चयनित रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि “प्रकाश शुक्ल के रचनाकर्म का केन्द्रीय आधार संवादधर्मिता है। उनके लेखन में हिंदी की समृद्ध परंपराएँ जीवंत हैं और इस संकलन में उनकी बहुआयामी रचनात्मकता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।”मुख्य वक्ता प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि लिखना एक बड़ा हुनर है, लेकिन सम्पादन उससे भी बड़ा कौशल है। उन्होंने टिप्पणी की कि प्रो. कमलेश वर्मा ने इस संचयन को श्रम और विवेक से तैयार किया है, जिसमें शुक्ल के रचनाकर्म को समयानुक्रम में प्रस्तुत किया गया है।अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ने कहा कि शुक्ल की रचनाओं में साफगोई और सम्प्रेषणीयता अधिक है। विशेषकर उनके संस्मरणों में उनकी साहित्यिक प्रतिभा खुलकर सामने आती है।लेखक प्रो. प्रकाश शुक्ल ने कहा कि यह पुस्तक ‘संचयन’ नहीं बल्कि ‘चयन’ है।
उन्होंने अपने लेखन के दो प्रमुख बिंदुओं—नवाचारिता और प्रश्नाकुलता—का उल्लेख करते हुए कहा कि कवि हमेशा अधूरा रहता है और निरंतर रचने की इच्छा उसके भीतर बनी रहती है।पुस्तक के संपादक प्रो. कमलेश वर्मा ने कहा कि इस संकलन का उद्देश्य शुक्ल के रचनाकर्म के हर पहलू का प्रतिनिधित्व करना है।परिचर्चा में डॉ. प्रभात कुमार मिश्र, डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे और कहा कि इस संचयन ने शुक्ल की रचनात्मक विविधता को नई रोशनी में प्रस्तुत किया है।कार्यक्रम का संचालन डॉ. विंध्याचल यादव ने किया, जबकि स्वागत वक्तव्य डॉ. राजकुमार मीणा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रविशंकर सोनकर ने दिया। कुलगीत की प्रस्तुति आदित्य और अपराजिता ने की।इस अवसर पर प्रो. कृष्णमोहन, प्रो. नीरज खरे, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. अमित पाण्डेय, डॉ. धीरेंद्र चौबे सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
