वाराणसी में बुर्का और हिजाब पहनने वाली महिलाओं को लेकर लगाए गए पोस्टरों ने शहर का सियासी और सामाजिक माहौल गर्मा दिया है। शहर के एक प्रमुख बाजार क्षेत्र में कुछ व्यापारियों ने अपनी दुकानों के बाहर ऐसे पोस्टर लगाए हैं, जिनमें बुर्का-हिजाब पहनने वाली महिलाओं के लिए दुकानों में प्रवेश वर्जित बताया गया है। पोस्टरों में यह भी लिखा गया है कि यदि बुर्कानशीं महिलाएं चेहरा दिखाकर दुकान में प्रवेश करती हैं तो उन्हें ज्वेलरी उपहार में दी जाएगी।इस घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय गलियारों तक तीखी बहस शुरू हो गई है। कई लोगों ने इसे धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। सामाजिक संगठनों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का कहना है कि इस तरह के पोस्टर संविधान में दिए गए समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के खिलाफ हैं और इससे समाज में नफरत और विभाजन को बढ़ावा मिल सकता है।
वहीं, पोस्टर लगाने वाले कुछ व्यापारियों का दावा है कि यह कदम सुरक्षा कारणों से उठाया गया है। उनका कहना है कि पिछले कुछ समय से बाजारों में चोरी और ठगी की घटनाएं बढ़ी हैं, ऐसे में चेहरा ढका होने से पहचान में दिक्कत आती है। हालांकि, ज्वेलरी देने जैसे दावों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसे कई लोग उकसावे और प्रचार का तरीका बता रहे हैं।मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। विपक्षी दलों ने इसे एक खास समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश करार दिया है और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। वहीं, कुछ संगठनों ने व्यापारियों के समर्थन में बयान देते हुए इसे ‘सुरक्षा से जुड़ा फैसला’ बताया है।
घटना की जानकारी मिलने के बाद जिला प्रशासन और पुलिस सक्रिय हो गई है। अधिकारियों ने कहा है कि पोस्टरों की जांच की जा रही है और यह देखा जाएगा कि क्या यह किसी कानून या दिशा-निर्देश का उल्लंघन करता है। प्रशासन ने साफ किया है कि किसी भी तरह से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने या भेदभाव फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।फिलहाल, काशी में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लोग इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और क्या इस तरह के पोस्टर सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। प्रशासन की कार्रवाई और आगे के फैसलों पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं।


