अंतर्राष्ट्रीय काशी घाटवाक विश्वविद्यालय की मनी वर्षगांठ, अनियंत्रित डिजिटल निर्भरता पर हुई चर्चा

अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवाक विश्वविद्यालय की 8वीं वर्षगांठ का भव्य उद्घाटन रीवाघाट पर संपन्न हुआ। इस वर्ष आयोजन का केंद्रीय विषय ‘मोबाइल के दास नहीं, चलें घाट के पास’ रखा गया, जिसमें अनियंत्रित डिजिटल निर्भरता और उसके सामाजिक, सांस्कृतिक व मानसिक प्रभावों पर गंभीर विमर्श किया गया।कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन देते हुए काशी घाटवाक विश्वविद्यालय के संस्थापक प्रो. विजयनाथ मिश्र ने कहा कि स्वस्थ और उल्लासमय जीवन के लिए काशी में घाटवाक अत्यंत आवश्यक है। घाटवाक मनुष्य को रील की दुनिया से निकालकर रियल जीवन का साक्षात्कार कराते हैं।आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए संस्थापक सदस्य प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि काशी के घाट यंत्रस्थ नहीं बल्कि आत्मस्थ होने की प्रेरणा देते हैं। अनियंत्रित यांत्रिक जीवन के बीच घाटवाक मनुष्य को सहज, संतुलित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का आधार प्रदान करता है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य ने कहा कि काशी के घाट केवल भौगोलिक संरचनाएं नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निर्मिति हैं। ये मनुष्य की मुक्ति के जीवंत विग्रह हैं।


मुख्य अतिथि प्रो. विश्वम्भर नाथ मिश्र ने गंगा और घाटों के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि काशी के घाट इस नगरी के सांस्कृतिक कोड हैं और उनकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।इस अवसर पर अपर नगर आयुक्त अमित कुमार, प्रो. अरविंद जोशी और रमेश पांडेय ने भी अपने विचार व्यक्तकिए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. उदय पाल ने किया।घाटवाक के दौरान सामाजिक योगदान के लिए अभ्युदय संस्था, रोटी बैंक, होप फाउंडेशन, काशी परिक्रमा, मालवीय सेवा संस्थान एवं नंदिनी फाउंडेशन को सम्मानित किया गया।मार्ग में हरिश्चंद्र घाट पर देवेंद्र दास के संयोजन में ‘ताना-बाना’ समूह द्वारा कबीर गायन प्रस्तुत किया गया, वहीं चेत सिंह घाट पर अष्टभुजा मिश्र के निर्देशन में नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।मानसरोवर घाट पर महिला सम्मान कार्यक्रम आयोजित हुआ, जहां धनावती देवी की अध्यक्षता में ‘तकनीकी निर्भरता और लिंग विभेद’ विषय पर चर्चा हुई। धनावती देवी ने काशी घाटवाक की सराहना करते हुए श्रम की पहचान और महिलाओं को स्वाभिमानपूर्वक जीवन जीने का संदेश दिया।चर्चा में एथलीट नीलू ने कहा कि तकनीक और जीवन के बीच संतुलन आवश्यक है। इस अवसर पर सुषमा शुक्ल, जूही त्रिपाठी, डॉ. आस्था, चिकित्सक डॉ. रेनू, निहारिका रॉय ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सभी को सम्मानित किया गया।


इस सत्र का संयोजन डॉ. शारदा सिंह ने किया।कार्यक्रम का समापन राजघाट पर हुआ। यहां ‘घाटवाक के अनुभव’ विषय पर अध्यक्षता करते हुए प्रो. अरविंद जोशी ने कहा कि मोबाइल के दुरुपयोग को रोकने के लिए समाज से जुड़ना अनिवार्य है।प्रो. राकेश कुमार मिश्र ने कहा कि मानव जीवन को सही अर्थों में समझने के लिए घाटों से जुड़ना आवश्यक है, जबकि गौरीशंकर मिश्र ने कहा कि जीवन ऊर्जा के संचार का माध्यम ही घाटवाक का मूल उद्देश्य है।इस अवसर पर डॉ. महेंद्र कुशवाहा, डॉ. विन्ध्याचल यादव और डॉ. मनकामना शुक्ल ने भी अपने विचार रखे।समापन सत्र का संचालन डॉ. आर्यपुत्र दीपक ने किया, धन्यवाद ज्ञापन शैलेश तिवारी ने तथा संयोजन सुधीर त्रिपाठी ने किया।यहीं पर बीएचयू के संगीत विभाग की डॉ. श्यामा एवं उनकी टीम द्वारा ‘साधो ऐसा ही गुरु भावे’ सहित अन्य भजनों की मनोहारी संगीतमय प्रस्तुति दी गई।कार्यक्रम में रितु सिंह, मनीष खत्री, किशन दीक्षित, दिलीप साहनी, सी.बी. त्रिपाठी, आनंद मिश्र, अजय राय, कुबेर तिवारी, अमित राय, अभिषेक गुप्ता, वाचस्पति उपाध्याय, अरविंद पटेल, रवि अग्रहरि, कृष्ण मोहन पांडेय, यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।



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