महाकवि जयशंकर प्रसाद की जयंती के अवसर पर उनके निवास प्रसाद मंदिर में “महाकवि जयशंकर प्रसाद साहित्य संस्कृति महोत्सव” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी ने किया।इस अवसर पर कुलपति प्रो. अजीत चतुर्वेदी ने कहा कि यह समारोह प्रसाद जी की कृतियों, साहित्यिक धरोहर और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि प्रसाद की जयंती में शामिल होना किसी तीर्थ यात्रा जैसा अनुभव है। समाज की निरंतरता बनाए रखने में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने प्रसाद साहित्य पर और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि प्रसाद की रचनाओं में बारीकी, शालीनता और गहनता के साथ ओजस्विता का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
प्रो. सुमन जैन ने कहा कि ऐसे आयोजन प्रसाद साहित्य को आम पाठकों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनते हैं। उन्होंने कहा कि काशी के साहित्यकारों में तुलसीदास और जयशंकर प्रसाद दो हिमालयी व्यक्तित्व रहे हैं। प्रसाद ने अपने साहित्य में स्त्री विषयों को भी गंभीरता से प्रस्तुत किया।बस्ती से आए साहित्यकार अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि विश्व के हिंदी साहित्य में काशी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कहा कि ‘कामायनी’ हिंदी साहित्य की ऐसी अमूल्य धरोहर है जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा।समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. इंदीवर ने कहा कि प्रसाद युग प्रवर्तक साहित्यकार थे और छायावाद की त्रयी निर्माण में उनकी भूमिका सर्वोपरि रही।
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दयानिधि मिश्र, हिमांशु उपाध्याय, डॉ. कवीन्द्र नारायण, सुरेंद्र वाजपेयी, गौतम अरोड़ा सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत जयशंकर प्रसाद की प्रपौत्री एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. कविता प्रसाद ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राम सुधार सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अवधेश प्रसाद ने किया।समारोह के बाद भव्य संगीत कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें पद्मश्री देवब्रत मिश्र ने सितार वादन प्रस्तुत किया। सुचरिता गुप्ता ने गायन प्रस्तुति दी। वहीं जयपुर से आई विजय लक्ष्मी और डॉ. अपर्णा मक्कर ने प्रसाद जी के काव्य पर नृत्य प्रस्तुति दी।

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