बनारस लिटरेचर फेस्टिवल के चौथे संस्करण की अंतिम संध्या यादगार बन गई, जब मंच पर अभिनेता, गीतकार, संगीतकार और गायक पीयूष मिश्रा मौजूद थे। उनकी प्रस्तुति केवल संगीत नहीं, बल्कि किस्सों, अनुभवों और भावनाओं से भरी एक संगीतमय यात्रा थी। बातचीत के सहज अंदाज़ में उन्होंने अपने चर्चित और कम चर्चित गीतों की शृंखला प्रस्तुत की, जिसने श्रोताओं को पूरी तरह बांधे रखा।शाम ढलते-ढलते ठंड तेज़ हो चली थी, लेकिन पीयूष मिश्रा को सुनने का जुनून इतना गहरा था कि हजारों लोग खुले आसमान के नीचे देर रात तक जमे रहे।
पूरा सुर प्रवाह प्रांगण खचाखच भरा रहा। हारमोनियम के साथ मंच पर खड़े पीयूष जब गीतों के बोल इशारों और संवाद की तरह पेश कर रहे थे, तो ऐसा लग रहा था मानो वे कोई जीवंत कहानी सुना रहे हों।उन्होंने अपने शुरुआती दिनों के गीतों से कार्यक्रम की शुरुआत की। दूरदर्शन के दौर की याद दिलाने वाला गीत हो या ‘बुंदेलों हर बोलों…’ जैसी अतरंगी रचना—हर प्रस्तुति पर श्रोता झूमते नज़र आए। संघर्ष के दिनों में लिखे गीत ‘वो सुहाने दिन…’ पर पुराने प्रशंसक खुद को रोक नहीं पाए और उनकी पंक्तियां साथ-साथ दोहराने लगे।
चवन्नी पर आधारित व्यंग्यात्मक गीत हो या फिर बेहद लोकप्रिय इक बगल में चांद होगा…’ — हर गीत पर तालियों की गूंज बढ़ती गई। अंत में जब उन्होंनेआरंभ है प्रचंड…’ गाया, तो माहौल जोश और ऊर्जा से भर उठा और उसी के साथ इस यादगार शाम का समापन हुआ।कार्यक्रम को लेकर उत्साह का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रशंसक शाम 5 बजे से ही कुर्सियों पर जमा थे। फ्लाइट लेट होने के कारण पीयूष मिश्रा देर से पहुंचे, तब तक पूरा परिसर भर चुका था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि साउंड टेस्टिंग के दौरान भी श्रोताओं को हटाना मुश्किल हो गया। स्थिति को संभालने के लिए मंच की लाइट बंद करनी पड़ी और अंततः पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

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