संत शिरोमणि गुरु रविदास की 649वीं जयंती के अवसर पर आज उनकी जन्मस्थली सीर गोवर्धनपुर में आस्था का विशाल सैलाब उमड़ पड़ा। देश-विदेश से करीब 10 लाख रैदासी श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए वाराणसी पहुंचे हैं। भोर से ही मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हो गया, जो पूरे दिन चलता रहेगा। जयंती को लेकर संत रविदास मंदिर और आसपास के क्षेत्रों को भव्य रूप से सजाया गया है, वहीं श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट द्वारा व्यापक इंतजाम किए गए हैं।जयंती के मौके पर सीर गोवर्धनपुर क्षेत्र पूरी तरह रैदासियों के शहर में तब्दील हो गया है। पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों से श्रद्धालुओं के जत्थे पहुंचे हैं, जबकि विदेशों में रहने वाले एनआरआई भक्त भी जयंती समारोह में शामिल हुए हैं। श्रद्धालुओं के ठहराव के लिए लगभग 125 टेंटों की टेंट सिटी बनाई गई है, जहां लंगर, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
मंदिर परिसर में अमृतवाणी पाठ के बाद लगभग 150 फीट ऊंची रविदासी पताका ‘हरि’ निशान साहिब फहराई गई। ऐतिहासिक इमली के पेड़ के नीचे संत रविदास जी के चित्र को भव्य रूप से सजाया गया है। पूरे परिसर में भजन-कीर्तन का आयोजन चल रहा है, जिसमें महिलाएं और पुरुष श्रद्धा के साथ भाग ले रहे हैं।सेवा व्यवस्था में हरियाणा, पंजाब, बिहार और झारखंड सहित अन्य राज्यों से आए करीब 5 हजार सेवादार लगे हुए हैं, जो लगभग 9 से 10 लाख श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं। सुबह से ही विशाल लंगर चल रहा है, जिसमें अब तक लाखों भक्त प्रसाद ग्रहण कर चुके हैं। बताया गया है कि 6 से अधिक भट्ठियों पर करीब 20 लाख रोटियां बनाई जा रही हैं और लगभग 15 क्विंटल से अधिक नमक की खपत हो रही है।श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। मेला क्षेत्र में अस्थायी पुलिस चौकी स्थापित की गई है और पूरे क्षेत्र की निगरानी के लिए 200 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। बड़ी संख्या में पुलिस बल, पीएसी और फायर टेंडर तैनात किए गए हैं। साथ ही संत रविदास मंदिर की ओर जाने वाले मार्गों पर वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है और वैकल्पिक मार्गों से यातायात को डायवर्ट किया गया है।मान्यता है कि सीर गोवर्धनपुर में ही 649 वर्ष पूर्व संत रविदास का जन्म हुआ था। इसी स्थान पर 1965 में संत सरवन दास जी महाराज द्वारा मंदिर की नींव रखी गई थी और 1972 में इसका निर्माण पूरा हुआ। आज यह मंदिर रैदासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जिसे 130 किलो सोने की पालकी, स्वर्ण कलश, स्वर्ण छत्र और अखंड स्वर्ण दीपक के कारण ‘दूसरा गोल्डन टेंपल’ भी कहा जाता है। संत रविदास की जयंती पर काशी में भक्ति, समरसता और सेवा का अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है।


