उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर गरमाई हुई है, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तंज कसा, कि उन्हें 40 दिनों में यह साबित करना चाहिए कि वे असल हिंदू हैं, नहीं तो उन्हें ढोंगी या वेशधारी कहा जाएगा। इस बयान ने पूरे राजनीतिक वातावरण को और तंग कर दिया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेले में हुई घटना और उसके बाद शासन-प्रशासन की भूमिका को लेकर तीखे शब्दों का उपयोग किया और सीएम योगी से धर्म और पवित्रता के प्रमाण की मांग की। इसके बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस विवाद पर शुक्रवार को विधानसभा में जवाब देते हुए कहा कि “हर कोई शंकराचार्य नहीं लिख सकता” और कानून सबके लिए समान है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी को भी धार्मिक पद, आचार्यत्व या आध्यात्मिक शीर्षक का इस्तेमाल सरकारी कार्यालयों या प्रशासकीय मामलों में अलग-थलग विशेषाधिकार के रूप में नहीं करना चाहिए। राज्य की राजनीति में इस विवाद के कारण आवाज़ें दो हिस्सों में बंटती दिखाई दे रही हैं। विपक्ष इस मुद्दे को ब्राह्मण अस्मिता के मुद्दे से जोड़ रहा है, जबकि सरकार इसे कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा का मसला बता रही है। डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने भी 101 बटुकों को सम्मानित कर के घटना के बाद ब्राह्मण समुदाय के प्रति सम्मान का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन फिर भी विवाद थमता नहीं दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बयानबाजी आगामी चुनावी माहौल को भी प्रभावित कर सकती है, क्योंकि धर्म-संस्कृति और धार्मिक पहचान के मुद्दे उत्तर प्रदेश की राजनीति में संवेदनशील भूमिका निभाते हैं।
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