वाराणसी में गोंड अनुसूचित जनजाति के लोगों ने कथित उत्पीड़न एवं जाति प्रमाण-पत्रों के मनमाने निरस्तीकरण के विरोध में जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा शासनादेशों और न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करते हुए गोंड समाज के लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है।ज्ञापन में विशेष रूप से जिला समाज कल्याण अधिकारी पर आरोप लगाया गया कि माननीय उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के निर्देशों के बावजूद “गोंड” और “गोड़” को अलग-अलग मानते हुए विभेद किया जा रहा है, जबकि यह केवल उच्चारणगत भिन्नता (Phonetic Variation) है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों एवं जिला स्तरीय समिति की संस्तुतियों की अवहेलना की जा रही है।
इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा समय-समय पर जारी विभिन्न शासनादेशों का हवाला देते हुए कहा गया कि भू-राजस्व अभिलेखों, परिवार रजिस्टर और विद्यालय की टीसी में दर्ज जाति को अमान्य ठहराकर गोंड समाज के लोगों को अन्य श्रेणी में दर्ज किया जा रहा है। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि उत्तर प्रदेश लोकसेवा आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 9 के अनुसार अधिकारियों को स्वेच्छाचारी अधिकार प्राप्त नहीं हैं, इसके बावजूद ऑनलाइन आवेदनों को पर्याप्त साक्ष्य के बावजूद निरस्त किया जा रहा है।गोंड समाज के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि जिला स्तरीय जाति प्रमाण-पत्र सत्यापन समिति, वाराणसी द्वारा पूर्व में पारित आदेशों का संज्ञान नहीं लिया जा रहा है और विधि-विरुद्ध ढंग से प्रमाण-पत्र निरस्त किए जा रहे हैं। इसे संविधान, प्रासंगिक अधिनियमों, शासनादेशों तथा उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना बताया गया।ज्ञापन के माध्यम से मांग की गई कि स्वेच्छाचारी तरीके से की जा रही जांच आख्या एवं प्रमाण-पत्र निरस्तीकरण की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए तथा विधि के अनुरूप कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, ताकि गोंड अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ हो रहे कथित उत्पीड़न पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

