देवाधिदेव की नगरी काशी में शिव–गौरा विवाह परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण अध्याय साकार हुआ। माता गौरा के गौने की परंपरागत हल्दी रस्म टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुई।108 थालों के चढ़ावे के साथ नौ गौरी–नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित हल्दी जब माता गौरा की चल प्रतिमा के अंग-अंग पर अर्पित की गई तो पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय गौरा’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।प्रातःकाल काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में वैदिक ब्राह्मणों द्वारा विशेष अनुष्ठान संपन्न किया गया। नौ गौरी और नौ दुर्गा के मंत्रों के साथ हल्दी का पूजन कर उसे अभिमंत्रित किया गया। शंखध्वनि और वैदिक ऋचाओं के मध्य संपन्न इस अनुष्ठान के बाद शोभायात्रा के रूप में हल्दी को टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास लाया गया। मार्ग में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर परंपरा का स्वागत किया।
सायंकाल टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में भव्य मंगल मंडप सजाया गया। रंग-बिरंगे पुष्पों, आम्रपल्लव और पारंपरिक सजावट से सुसज्जित परिसर श्रद्धा और उल्लास का केंद्र बना रहा।काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत पं. वाचस्पति तिवारी के सान्निध्य में 11 वैदिक ब्राह्मणों ने माता गौरा की चल प्रतिमा का विशेष पूजन कराया। इसके पश्चात परंपरागत रीति से अभिमंत्रित हल्दी अर्पित की गई।हल्दी चढ़ाने की रस्म के दौरान वातावरण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी घर में बेटी का गौना संपन्न हो रहा हो।अनुष्ठान के उपरांत माता गौरा का पारंपरिक बनारसी वस्त्रों, रत्नाभूषणों और पुष्पमालाओं से भव्य श्रृंगार किया गया। सिन्दूरी आभा से सुसज्जित स्वरूप ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक दर्शनार्थियों की कतारें लगी रहीं।महंत परिवार के अनुसार सभी अनुष्ठान शास्त्रीय विधानों के अनुरूप संपन्न हुए और श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं।हल्दी रस्म के साथ ही रंगभरी एकादशी तक चलने वाले मांगलिक क्रम का शुभारंभ हो गया है। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससुराल से अपने धाम लाते हैं, जिसके साथ पूरी काशी अबीर-गुलाल और भक्ति के रंगों में सराबोर हो उठती है।टेढ़ीनीम महंत आवास में संपन्न यह आयोजन काशी की जीवंत आस्था, लोकसंस्कृति और वैदिक परंपरा का अद्भुत संगम बनकर उभरा। यहां वेद मंत्रों की गूंज और महिलाओं के मंगलगीतों ने यह सिद्ध कर दिया कि काशी में परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं—उन्हें उत्सव बनाकर जिया जाता है।

