आज के दौर में महाभारत अध्ययन की बढ़ती आवश्यकता: डॉ. सुमन कुमार मिश्र

आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में महाभारत का अध्ययन पहले से कहीं अधिक आवश्यक माना जा रहा है। यह महाकाव्य भारतीय राजनीति, समाज, साहित्य, कला और नैतिक मूल्यों पर गहरा प्रभाव डालता रहा है। कर्तव्य, नेकी, साहस, दया और नैतिकता जैसे मूल्यों की स्थापना में महाभारत मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।महाभारत विश्व का सबसे विशाल महाकाव्य माना जाता है, जिसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं। यह आकार में होमर के ‘इलियड’ से भी बड़ा है। परंपरा के अनुसार इसकी रचना व्यास मुनि ने की थी। हिंदू संस्कृति में इसे एक मूल ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिसने भारतीय समाज और साहित्य के विभिन्न आयामों को आकार दिया है। भगवद गीता भी इसी महाकाव्य का एक महत्वपूर्ण अंश है।महाभारत का प्रभाव इतना व्यापक है कि इसके अनेक संस्करण और रूपांतरण सामने आए हैं तथा 108 भाषाओं में इसका अनुवाद किया जा चुका है। आधुनिक युग में भी फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक और डिजिटल माध्यमों के जरिए यह नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है।

मान्यता है कि महाभारत काल के पश्चात कलियुग का आरंभ हुआ, जिसे मानवता का चौथा और अंतिम युग माना जाता है। ऐसे समय में जब नैतिक मूल्यों के क्षरण की चर्चा होती है, महाभारत के संदेश और भी प्रासंगिक हो उठते हैं।इसी क्रम में वाराणसी के नेशनल हिंदू स्कूल से जुड़े डॉ. सुमन कुमार मिश्र द्वारा ‘महाभारत कथा’ का नियमित वाचन किया जा रहा है। यह कथा प्रतिदिन ऑनलाइन माध्यम से सजीव प्रसारण के रूप में प्रस्तुत की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रोता जुड़ते हैं। डॉ. मिश्र प्रतिदिन हिंदी में गीता प्रेस संस्करण के एक अध्याय का पाठ करते हुए उसके नैतिक और सामाजिक संदेशों की व्याख्या करते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में महाभारत का अध्ययन न केवल सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करता है, बल्कि समाज को नैतिक दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


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