भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली ने प्रमाणिक दस्तावेजों और प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के अध्ययन के बाद यह स्वीकार किया है कि वाराणसी के सारनाथ स्थल को सबसे पहले बाबू जगत सिंह द्वारा कराए गए उत्खनन से प्रकाश में लाया गया था।इस मान्यता के आधार पर ASI द्वारा 10 फरवरी 2026 के तहत सारनाथ परिसर में एक नया संशोधित शिलापट्ट स्थापित किया गया है।बताया गया कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन कार्य की शुरुआत कराई थी, लेकिन लंबे समय तक यह तथ्य इतिहास के पन्नों में दबा रहा। पिछले कुछ वर्षों से जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति द्वारा प्रामाणिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस विषय पर लगातार शोध किया जा रहा था, जिसके बाद अब इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक और उनकी छठी पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने बताया कि यह कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से संभव हो पाया है। उन्होंने कहा कि शोध समिति ने प्रमाणित दस्तावेज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को उपलब्ध कराए, जिसके आधार पर औपनिवेशिक काल से चली आ रही गलत मान्यता को समाप्त किया गया।उन्होंने बताया कि इस कार्य में काशी के विद्वानों, विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षकों, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, कोलकाता विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय के वर्तमान व सेवानिवृत्त प्रवक्ताओं का भी योगदान रहा। प्रदीप नारायण सिंह ने कहा कि यह निर्णय वाराणसी के साथ-साथ पूरे देश के लिए गर्व का विषय है और इससे बाबू जगत सिंह के ऐतिहासिक योगदान को उचित सम्मान मिला है।

