काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सभागार में “महिला आरक्षण बिल—सशक्तिकरण की पहल या राजनीतिक रणनीति” विषय पर अकादमिक विमर्श आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार रखे।मुख्य अतिथि प्रो. अखिलेन्द्र पांडेय ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे सरकार की छवि सुधारने का प्रयास बताया। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए राजेंद्र प्रसाद और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच हुए विमर्श तथा मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट का जिक्र किया। साथ ही न्यायपालिका में महिलाओं की सीमित भागीदारी को भी रेखांकित किया।
प्रो. मल्लिकार्जुन जोशी ने इसे डिलिमिटेशन से जोड़ते हुए “राजनीतिक छल” करार दिया, जबकि प्रो. एन.के. दुबे ने इसे पूरी तरह राजनीतिक रणनीति बताया। हिंदी विभाग की डॉ. प्रियंका सोनकर ने महिलाओं के लिए ठोस क्रियान्वयन और ओबीसी महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए।प्रो. राजीव मंडल ने “प्रधानपति” की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि महिलाओं को वास्तविक सशक्तिकरण की जरूरत है, न कि प्रतीकात्मक भागीदारी की। वहीं जागृति राही ने मतदाता सूची (SIR) और आरक्षण के व्यावहारिक पहलुओं को जोड़ते हुए कई सवाल खड़े किए।कार्यक्रम के संयोजक प्रो. अवधेश सिंह और सह-संयोजक कुसुम वर्मा रहीं, जबकि संचालन डॉ. शार्दूल चौबे ने किया। विमर्श में महिला आरक्षण के विभिन्न पहलुओं पर गहन चर्चा हुई।


