मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की सख्ती का असर अब भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से कच्चे तेल और एलपीजी गैस की आपूर्ति बाधित होने के कारण देश की ऊर्जा जरूरतों पर दबाव बढ़ गया है। इसी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है।सरकार अब समुद्र के नीचे छिपे संभावित तेल और गैस भंडारों की खोज के लिए एक व्यापक सर्वे अभियान शुरू करेगी। इस परियोजना को तकनीकी रूप से "2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक एंड ग्रेविटी-मैग्नेटिक डेटा एक्विजिशन, प्रोसेसिंग एंड इंटरप्रिटेशन" कहा जाता है। इस प्रक्रिया के तहत विशेष सर्वे जहाज समुद्र में स्ट्रीमर्स नामक लंबी केबल जैसे उपकरणों की मदद से ध्वनि तरंगें भेजेंगे। ये तरंगें समुद्र तल के नीचे चट्टानों से टकराकर वापस लौटेंगी, जिनके विश्लेषण से वैज्ञानिक समुद्र के भीतर कई किलोमीटर गहराई तक की संरचना का नक्शा तैयार करेंगे।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समुद्र के भीतर मौजूद तेल और गैस के संभावित स्रोतों की पहचान करना है। वर्तमान में भारत अपनी लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, जबकि गैस के लिए भी काफी हद तक बाहरी निर्भरता बनी हुई है। ऐसे में वैश्विक संघर्षों का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और आम लोगों के खर्च पर पड़ता है।विशेषज्ञों का मानना है कि जहां पश्चिमी तट पर स्थित मुंबई हाई जैसे क्षेत्र पहले से विकसित हैं, वहीं पूर्वी तट अब भी काफी हद तक अनछुआ है। आधुनिक सीस्मिक तकनीक के जरिए इस क्षेत्र की गहराई से जांच कर भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

