जजों की छुट्टियों को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत और केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर स्पष्ट पक्ष रखा। चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह मामला उठा।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों का काम सामान्य दफ्तर के समय तक सीमित नहीं होता। उन्होंने बताया कि जजों को रोज बड़ी संख्या में केस फाइलों का अध्ययन करना पड़ता है और वकील भी देर रात तक तैयारी में जुटे रहते हैं। ऐसे में मानसिक रूप से गहन कार्य के बीच विश्राम जरूरी होता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत है और यहां दिए गए फैसलों का दूरगामी प्रभाव होता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी निर्णय में गलती हो जाती है तो उसका गंभीर परिणाम हो सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि अवकाश या आंशिक कार्य दिवसों के दौरान भी जजों को कई महत्वपूर्ण फैसलों पर काम करना पड़ता है।वहीं, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि अदालतों की छुट्टियां पहले के मुकाबले कम की जा चुकी हैं और अवकाश के दौरान भी वेकेशन बेंच के माध्यम से जरूरी मामलों की सुनवाई जारी रहती है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि आम लोगों को न्यायपालिका की कार्यप्रणाली की पूरी जानकारी नहीं होती। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोशल मीडिया पर हो रही आलोचनाओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आजकल हर कोई खुद को विशेषज्ञ समझने लगा है।मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को निर्धारित की गई है।


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