दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET 2026 पेपर लीक को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच 1974 के गुजरात के ऐतिहासिक नवनिर्माण आंदोलन की चर्चा फिर तेज हो गई है। यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े छात्र आंदोलनों में गिना जाता है, जिसने एक चुनी हुई राज्य सरकार को इस्तीफा देने और अंततः विधानसभा भंग करने पर मजबूर कर दिया।
इस आंदोलन की शुरुआत दिसंबर 1973 में अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज से हुई। उस समय महंगाई और राशन संकट के कारण कॉलेज हॉस्टल के मेस का मासिक बिल बढ़ा दिया गया। छात्रों ने इसका विरोध करते हुए 20 दिसंबर 1973 को हड़ताल शुरू कर दी। कुछ ही दिनों में यह विरोध गुजरात विश्वविद्यालय और फिर पूरे राज्य में फैल गया।
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शुरुआत में छात्रों की मांग केवल मेस शुल्क कम करने की थी, लेकिन जल्द ही आंदोलन ने महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की कार्यशैली के खिलाफ व्यापक रूप ले लिया। छात्रों के साथ शिक्षक, वकील, कर्मचारी, मजदूर और मध्यम वर्ग भी जुड़ गया। आंदोलन को संगठित करने के लिए 'नवनिर्माण युवक समिति' का गठन किया गया।
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उस समय गुजरात में कांग्रेस के चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे और जनता में भारी नाराजगी थी। आंदोलन तेज होने पर राज्यभर में बंद, धरना, प्रदर्शन और पुलिस के साथ झड़पें हुईं। कई शहरों में कर्फ्यू लगाया गया और स्थिति संभालने के लिए सेना तक बुलानी पड़ी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार आंदोलन के दौरान 100 से अधिक लोगों की मौत हुई और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
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लगातार बढ़ते जनदबाव के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप किया। 9 फरवरी 1974 को मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद भी आंदोलन जारी रहा और छात्रों ने विधानसभा भंग करने की मांग की। अंततः 16 मार्च 1974 को गुजरात विधानसभा भंग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार नवनिर्माण आंदोलन ने बाद में जयप्रकाश नारायण के 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन को भी प्रेरित किया। इसे आज़ाद भारत के सबसे प्रभावशाली छात्र आंदोलनों में से एक माना जाता है, जिसने यह दिखाया कि छात्र और जनता का संगठित आंदोलन राजनीतिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।
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