वाराणसी में समान शिक्षा अधिकार की गूंज, शिक्षा और भूमि अधिग्रहण पर हुई चर्चा

वाराणसी। समान शिक्षा अधिकार की मांग को लेकर निकली मुंशी प्रेमचंद–सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'–लोकबंधु राजनारायण–आचार्य नरेन्द्र देव पदयात्रा मंगलवार को दूसरे दिन राजातालाब क्षेत्र के गंजारी पहुंची। दोपहर करीब एक बजे किसानों, ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने पदयात्रियों का स्वागत किया।"चाहे अमीर की हो या गरीब की संतान, सबकी शिक्षा हो समान" के संदेश के साथ शुरू हुई यह पदयात्रा जनकवि धूमिल की जन्मस्थली खेवली से विभिन्न गांवों से गुजरते हुए लोकबंधु राजनारायण की जन्मस्थली गंजारी पहुंची। यहां लोकबंधु राजनारायण के भतीजे सुभाष सिंह, किसान नेता अजीत वर्मा, विनय, राजेश प्रजापति, हरपुर के ग्राम प्रधान शिवकुमार राजभर, गंजारी के ग्राम प्रधान अमित कुमार सहित बड़ी संख्या में किसानों और ग्रामीणों ने पदयात्रा का स्वागत किया।

गंजारी में आयोजित किसान-मजदूर सभा को संबोधित करते हुए रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित डॉ. संदीप पाण्डेय ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत किए जा रहे कई प्रयोगों का सबसे अधिक असर गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को बाजार का माध्यम नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार माना जाना चाहिए।

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लोक समिति के संयोजक नंदलाल मास्टर ने आरोप लगाया कि प्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था लगातार कमजोर की जा रही है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में शिक्षक पद खाली हैं और कई सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं, जबकि निजी शिक्षण संस्थानों का तेजी से विस्तार हो रहा है। वहीं ईश्वर चंद त्रिपाठी ने कहा कि शिक्षा के व्यवसायीकरण से समाज में आर्थिक असमानता और बढ़ रही है।सभा के दौरान किसानों ने प्रस्तावित स्पोर्ट्स स्टेडियम सहित अन्य परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण पर भी चिंता जताई। किसान संघर्ष समिति के अजीत वर्मा ने कहा कि किसानों की सहमति, उचित मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास के बिना किसी भी भूमि अधिग्रहण को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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कार्यक्रम के अंत में पदयात्रियों ने लोकबंधु राजनारायण को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि समान शिक्षा, किसानों और मजदूरों के अधिकार, रोजगार तथा सामाजिक न्याय के मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं। पदयात्रा में किसान, मजदूर, छात्र-युवा और बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल रहे।

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