लोहगढ़ फोर्ट मर्डर केस: क्या अदालत में टिक पाएगी पुलिस की थ्योरी? आरुषि केस जैसा कानूनी दांव पड़ सकता है भारी

पुणे के लोहगढ़ फोर्ट से गिरकर 26 वर्षीय कारोबारी केतन अग्रवाल की मौत का मामला अब देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया है। शुरुआत में इसे ट्रेकिंग के दौरान हुआ हादसा माना गया था, लेकिन पुलिस जांच के बाद यह मामला कथित हत्या की साजिश में बदल गया। इस मामले में केतन की मंगेतर सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस का आरोप है कि दोनों ने मिलकर केतन को रास्ते से हटाने की योजना बनाई और उसे किले से धक्का देकर मार डाला। हालांकि, अदालत में किसी भी आरोपी को दोषी साबित करने के लिए केवल पुलिस की कहानी या आरोप पर्याप्त नहीं होते। कानून के अनुसार अभियोजन पक्ष को ऐसे ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने होंगे, जिनसे यह संदेह की कोई गुंजाइश न बचे कि केतन की मौत हादसा नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या थी।

पुलिस का दावा है कि सिया अपनी तय शादी से खुश नहीं थी और चेतन के साथ उसके संबंध थे। जांच में कैफे में हुई मुलाकातों, कथित साजिश, फोन रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, लोकेशन डेटा और डिजिटल साक्ष्यों को अहम माना जा रहा है। जांच एजेंसियां मोबाइल डेटा, चैट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की भी जांच कर रही हैं ताकि घटनाक्रम की पूरी कड़ी अदालत में पेश की जा सके। लेकिन इस केस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अब तक कोई प्रत्यक्ष चश्मदीद सामने नहीं आया है, जो यह बता सके कि केतन को वास्तव में किसने धक्का दिया। ऐसे में पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका हुआ है। 

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कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कथित कबूलनामा अदालत में पर्याप्त नहीं माना जाता, क्योंकि पुलिस हिरासत में दिए गए बयान सामान्यतः साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होते। भारतीय कानून के अनुसार परिस्थितिजन्य साक्ष्यों वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 'पंचशील सिद्धांत' लागू होते हैं। इनके अनुसार हर परिस्थिति पूरी तरह सिद्ध होनी चाहिए, सभी सबूत केवल आरोपी की ओर ही इशारा करें और सबूतों की कड़ी इतनी मजबूत हो कि किसी दूसरी संभावना की गुंजाइश न बचे।यही वजह है कि इस मामले की तुलना आरुषि-हेमराज हत्याकांड से की जा रही है। 

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उस केस में भी अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं कर पाया था और अंततः हाईकोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था।अब लोहगढ़ फोर्ट मर्डर केस में भी अदालत यह देखेगी कि क्या पुलिस घटनास्थल, फॉरेंसिक जांच, डिजिटल साक्ष्यों और अन्य परिस्थितियों को जोड़कर ऐसी मजबूत और अटूट कड़ी बना पाती है, जिससे यह निर्विवाद रूप से साबित हो सके कि केतन की मौत दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या थी। जब तक अदालत अंतिम फैसला नहीं सुनाती, सिया गोयल और चेतन चौधरी कानून की नजर में केवल आरोपी हैं, दोषी नहीं। 

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