53 साल पुराना अरुणा शानबाग केस: दोषी 7 साल बाद आजाद, पीड़िता ने 42 साल तक भुगती 'उम्रकैद'

क्राइम फाइल्स के दूसरे एपिसोड में देश के सबसे चर्चित और दर्दनाक आपराधिक मामलों में से एक, अरुणा शानबाग केस को दिखाया गया है। यह मामला 27 नवंबर 1973 का है, जब मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल में कार्यरत 25 वर्षीय नर्स अरुणा शानबाग पर अस्पताल के एक सफाई कर्मचारी सोहनलाल वाल्मीकि ने हमला किया। आरोपी ने ड्यूटी के बाद कपड़े बदल रही अरुणा पर हमला किया और उनकी गर्दन में धातु की चेन कस दी, जिससे उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और उन्हें गंभीर मस्तिष्क क्षति हुई। इस हमले के बाद अरुणा कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सकीं। 

घटना के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि उस पर हत्या के प्रयास और लूट जैसे आरोप लगाए गए, लेकिन दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया गया। अदालत ने उसे सात साल की सजा सुनाई। सजा पूरी करने के बाद वह जेल से रिहा हो गया, जबकि अरुणा लगभग 42 वर्षों तक अस्पताल के बिस्तर पर अचेत अवस्था  में रहीं। उनकी देखभाल KEM अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों ने लगातार की। 

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साल 2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति तो नहीं दी, लेकिन अपने ऐतिहासिक फैसले में देश में कुछ शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता देने का रास्ता खोल दिया। यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। 

Adertisement

18 मई 2015 को अरुणा शानबाग का निधन हो गया। करीब 42 साल तक बिस्तर पर रहने के बावजूद उनके साथ हुई इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और महिलाओं की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था तथा इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दों पर व्यापक बहस छेड़ दी। आज भी यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है।

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