इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यौन उत्पीड़न जैसे संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलने पर पुलिस केवल इस आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती कि शिकायतकर्ता के पास व्हाट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं हैं। पुलिस की जिम्मेदारी शिकायत दर्ज कर निष्पक्ष जांच के दौरान सबूत जुटाने की है। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कंपनी के मालिक के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, आपराधिक धमकी और अन्य आरोपों वाली एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के शुरुआती चरण में शिकायतकर्ता पर सबूत जुटाने का बोझ नहीं डाला जा सकता।

मामले में कंपनी में प्रशासनिक पद पर कार्यरत एक महिला ने अपने नियोक्ता पर बार-बार यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और धमकी देने के आरोप लगाए थे। महिला ने पहले गाजियाबाद के वेव सिटी थाने और पुलिस कमिश्नर से शिकायत की, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसके बाद उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख किया। मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई 2026 को एफआईआर दर्ज कर जांच का आदेश दिया।
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हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर रद्द करने के चरण में आरोपों की सच्चाई का अंतिम फैसला नहीं किया जा सकता। शुरुआत में चैट या रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होना शिकायत को झूठा साबित नहीं करता। जांच के दौरान पुलिस कॉल डिटेल, लोकेशन, ग्राहक विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटा सकती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला जांच और बाद में आपराधिक अदालत की प्रक्रिया में होगा।  |
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हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध सामने आने के बावजूद पुलिस ने शुरुआत में एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को गाजियाबाद पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कर चार सप्ताह में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। |
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