वाराणसी। गोस्वामी तुलसीदास विचार परिषद की ओर से तुलसी प्राकट्य दिवस के अवसर पर ‘केसरिया भारत के आयाम’ एवं सनातन चेतना सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सनातन संस्कृति, भारतीय परंपराओं और लोककलाओं के संरक्षण पर चर्चा करते हुए नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का आह्वान किया गया।कार्यक्रम में सेवा संगठन ‘केसरिया भारत’ के प्रमुख संरक्षण कृष्णानंद पाण्डेय, धर्मसंघ शिक्षा मंडल एवं ‘केसरिया भारत’ के संरक्षक जगजीतन पाण्डेय सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। आयोजकों ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं और लोककलाओं को जन-जन तक पहुंचाने के साथ युवाओं में अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति जागरूकता पैदा करना है।
सावन की कजरी ने बांधा समां
कार्यक्रम में प्रसिद्ध गायिका रंजन राय ने सावन की पारंपरिक कजरी प्रस्तुत कर माहौल को लोकसंस्कृति की मधुरता से भर दिया। उन्होंने कहा कि तुलसी प्राकट्य दिवस के साथ सावन का पवित्र महीना भी चल रहा है और सावन तथा कजरी का गहरा संबंध है। इसी को ध्यान में रखते हुए धर्मसंघ में कजरी गायन के माध्यम से लोकपरंपरा को जीवंत रखने का प्रयास किया गया।रंजन राय ने कहा कि कजरी केवल लोकगीत नहीं, बल्कि पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। सावन में गांव-घर से लेकर सांस्कृतिक आयोजनों तक कजरी की विशेष परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के कारण युवा पीढ़ी का पारंपरिक लोकगीतों से जुड़ाव कम हो रहा है, जो चिंता का विषय है।उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को लोकगीत, लोकभाषा, संस्कृति और पारंपरिक त्योहारों से जोड़ना सभी की जिम्मेदारी है। यदि नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं को जानने और समझने का अवसर मिलेगा तो यह सांस्कृतिक विरासत आगे भी सुरक्षित रह सकेगी।
तुलसीदास की साहित्यिक विरासत को किया याद
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को धर्म, मर्यादा, संस्कार और लोकमंगल का संदेश दिया। उनकी साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रही है।वक्ताओं ने कहा कि तुलसी प्राकट्य दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी माध्यम है।



