वाराणसी की विकास योजना के तहत चौकाघाट स्थित रामलीला मैदान (लंका मैदान) के मुख्य गेट के पूर्वी हिस्से में लगभग 8 मीटर अंदर तक निशान लगाए जाने का मामला सामने आया है। इसे लेकर चित्रकूट रामलीला समिति ने चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है। समिति का कहना है कि यदि प्रस्तावित कार्य इसी स्वरूप में हुआ तो काशी की लगभग 483 वर्ष पुरानी चित्रकूट रामलीला के अस्तित्व और उसकी परंपरा पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।समिति द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए पत्र में बताया गया है कि गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन उनके प्रिय शिष्य नारायण दास उर्फ मेघा भगत ने संवत 1600 में चित्रकूट रामलीला की शुरुआत की थी। तब से यह रामलीला बिना किसी व्यवधान के लगातार आयोजित होती आ रही है और काशी की सबसे प्राचीन एवं परंपरागत रामलीलाओं में शामिल है।

पत्र में कहा गया है कि रामायण में वर्णित प्रसंगों के अनुरूप यह रामलीला आश्विन कृष्ण नवमी से प्रारंभ होकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक विभिन्न स्थलों पर आयोजित होती है। विशेष रूप से किष्किंधा कांड से लंकाकांड तक की लीलाएं चौकाघाट स्थित रामलीला मैदान में सदियों से आयोजित होती रही हैं। यही मैदान इस ऐतिहासिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है।समिति ने यह भी उल्लेख किया है कि विजयादशमी के बाद आश्विन शुक्ल एकादशी को आयोजित होने वाला नाटी इमली का विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप भी इसी रामलीला परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि रामलीला मैदान के स्वरूप में बदलाव होता है तो इसका असर काशी की इस ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर पर पड़ सकता है।समिति ने प्रशासन से विकास कार्यों के दौरान चित्रकूट रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए आवश्यक निर्णय लेने की मांग की है।
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