कर्बला के शहीदों की याद में चल रही अज़ादारी की रवायत के तहत वाराणसी में साठे का पारंपरिक जुलूस निकाला गया। दो महीने आठ दिन तक चले गम और मजलिसों के बाद निकले इस जुलूस में बड़ी संख्या में अज़ादार शामिल हुए और नौहाख्वानी व मातम के जरिए इमाम हुसैन और शहीदाने कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश किया।
जुलूस दालमंडी स्थित शब्बीर और सफदर के अजाखाने से शुरू हुआ। नौहाख्वानी और मातम के साथ जुलूस नई सड़क, काली महल, पितरकुंडा समेत विभिन्न मार्गों से होते हुए दरगाह-ए-फातमान पहुंचा। जुलूस में अलम, दुलदुल, ताबूत, तुरबत और अमारी की जियारत की गई।
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नौहों के जरिए कर्बला की दर्दनाक दास्तान सुनाई गई तो अज़ादारों की आंखें अश्कबार हो उठीं। मातम करते हुए अज़ादारों ने इमाम हुसैन और शहीदाने कर्बला के प्रति अपनी अकीदत का इजहार किया। फातमान पहुंचने पर अलविदाई मजलिस भी आयोजित की गई।
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साठे का जुलूस वाराणसी की सदियों पुरानी अज़ादारी की परंपरा और गंगा-जमुनी तहजीब का अहम हिस्सा माना जाता है। यह आयोजन कर्बला के संदेश—हक, इंसाफ, सब्र और जुल्म के सामने न झुकने—की याद दिलाता है।
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