रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला अपने पारंपरिक स्वरूप में आगे बढ़ रही है। रविवार को तीसरे दिन की लीला देखने के लिए बड़ी संख्या में लीला प्रेमी रामनगर पहुंचे। शाम ढलते ही अलग-अलग लीला स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी और जय श्रीराम के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा।
तीसरे दिन राजा दशरथ के दरबार से लीला का शुभारंभ हुआ। महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पहुंचकर राक्षसों के आतंक से ऋषि-मुनियों के यज्ञ में पड़ रही बाधा की जानकारी देते हैं और यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगते हैं। गुरु वशिष्ठ के समझाने पर दशरथ भारी मन से दोनों पुत्रों को विश्वामित्र के साथ भेज देते हैं। वन पहुंचने पर श्रीराम का ताड़का से सामना होता है और भीषण युद्ध के बाद प्रभु श्रीराम ताड़का का वध करते हैं। इसके बाद मारीच निरसन, सुबाहु वध, अहिल्या तारण, गंगा दर्शन, मिथिला प्रवेश और श्रीराम-जनक मिलन जैसे प्रसंगों का मंचन हुआ।
करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी रामनगर की रामलीला आज भी अपनी परंपराओं को संजोए हुए है। यहां आधुनिक मंच और तकनीक के बजाय पारंपरिक ढंग से लीला होती है। करीब चार किलोमीटर के क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर प्रसंग के अनुसार मंचन होता है और लीला प्रेमी भी पात्रों के साथ एक स्थल से दूसरे स्थल तक पहुंचते हैं। यही परंपरा रामनगर की रामलीला को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान देती है।


