वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति के चर्चित उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ के लोकार्पण सह परिचर्चा का आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग स्थित आचार्य रामचंद्र शुक्ल सभागार में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. श्रद्धा सिंह ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने उपन्यास के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रद्धा सिंह ने कहा कि ‘अगम बहै दरियाव’ पर चर्चा करना व्यापक अर्थों में गांव के जीवन को समझना और जीना है। उपन्यास में किसान और स्त्री जीवन के विविध पक्षों को प्रेम, प्रतिरोध, विद्रोह और राजनीति के संदर्भ में सामने लाया गया है। उन्होंने इसे भारतीय समाज की विडंबनाओं को उजागर करने वाला उपन्यास बताया।
मुख्य वक्ता प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि ‘अगम बहै दरियाव’ ग्रामीण जीवन के अंतरलोक का उपन्यास है, जिसका पुरातात्विक और ज्ञानमीमांसीय दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व है। नसबंदी, चकबंदी और नाकाबंदी के चक्र में बुना गया यह उपन्यास पराजितों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। इसमें किसानों के कर्ज, बीज, बाजार और बिजली जैसी समस्याओं के साथ गरीबों के शोषण के अनेक पहलुओं को प्रभावी ढंग से दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास पुनर्जन्म और कर्मफलवाद की गहरी आलोचना करते हुए भय से भरोसे की यात्रा को सामने लाता है।
उपन्यासकार शिवमूर्ति ने अपनी रचना प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि ‘अगम बहै दरियाव’ उनके अब तक के लिखे और जिए हुए अनुभवों का निचोड़ है। उन्होंने अपने कहानी लेखन और जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंग साझा किए तथा बताया कि उनके लिए कहानी लेखन की मूल प्रेरणा मुंशी प्रेमचंद रहे हैं। आलोचक प्रो. कुमार बीरेंद्र ने उपन्यास को चौतरफा घेरेबंदी का आख्यान बताते हुए कहा कि इसमें बनकट इलाके के पात्र अनेक सवालों के साथ पाठक के सामने खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि उपन्यास में समय के साथ पात्रों का विकास और उनके माध्यम से भविष्य के लिए उभरने वाले संदेश महत्वपूर्ण हैं। वहीं डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने उपन्यास में प्रेम संबंधों, उत्पीड़न और दुर्भाग्य के पक्षों पर प्रकाश डाला।
डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि उपन्यास का कथा प्रवाह इतना सहज है कि पाठक उसमें लगातार बहता चला जाता है। इसमें मानव जीवन और उसकी वेदना के साथ अवध की संस्कृति और जनजीवन की जीवंत छवियां दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि उपन्यास शोषण और उत्पीड़न के चित्रों के साथ लोकजीवन के भरोसे और संघर्ष की शक्ति को भी सामने लाता है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. रविशंकर सोनकर ने किया, जबकि स्वागत वक्तव्य संयोजक डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन दीक्षा मिश्र ने किया। कार्यक्रम में प्रो. बलिराज पाण्डेय, प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. मनोज सिंह, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. कमलेश वर्मा, प्रो. किंग्सन पटेल, डॉ. प्रभात कुमार मिश्र, प्रीति जायसवाल, डॉ. प्रियंका सोनकर, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, मनीष खत्री सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।


