जलेबा की मिठास, कजरी के सुर और रतजगे की रात, काशी में जीवंत हुई कजरी तीज की लोकपरंपरा

काशी में पर्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोकपरंपराओं और संस्कृति को जीवंत करने का अवसर भी होते हैं। कजरी तीज के मौके पर रविवार को वाराणसी में भी आस्था, परंपरा और उल्लास का ऐसा ही संगम देखने को मिला।कजरी तीज महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखने वाला पर्व है। इस दिन महिलाएं सुखी दांपत्य जीवन, पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर व्रत रखती हैं और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, इसलिए यह पर्व महिलाओं की आस्था और सुहाग से विशेष रूप से जुड़ा माना जाता है।

वहीं काशी में कजरी तीज की अपनी अलग लोकपरंपरा है। पर्व को लेकर बाजारों में सुबह से ही रौनक देखने को मिली। जलेबा की दुकानों पर लोगों की भीड़ रही और बड़ी संख्या में लोगों ने जलेबा की खरीदारी की। बारिश के बावजूद लोगों में उत्साह रहा।इसके बाद रात में रतजगे की परंपरा निभाई जाती है। महिलाएं एकजुट होकर देर रात तक कजरी और लोकगीत गाती हैं। 

खास बात यह है कि आधुनिकता के दौर में भी काशी की ये परंपराएं अपनी पहचान बनाए हुए हैं। जलेबा की मिठास से लेकर कजरी के सुर और रतजगे की परंपरा तक—कजरी तीज आज भी काशी के लोकजीवन में उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है।




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