वाराणसी। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला के 14वें दिन भरत मिलाप प्रसंग के भावपूर्ण मंचन में भाई के प्रति प्रेम, त्याग और समर्पण की अनुपम झलक देखने को मिली। चित्रकूट में भगवान राम से भेंट के बाद भरत ने उनसे चरण पादुका प्राप्त की और उसे सिर पर धारण कर अयोध्या लौटने का संकल्प लिया। इस प्रसंग ने रामलीला प्रेमियों को भावविभोर कर दिया।
लीला के दौरान अत्रि मुनि के साथ भरत, शत्रुघ्न और निषादराज ने विभिन्न रमणीक स्थलों के दर्शन किए। भरत द्वारा तीर्थों का जल एक कूप में अर्पित किए जाने के कारण अत्रि मुनि ने उसे भरतकूप नाम दिया। इसके बाद सभी ने भगवान राम के आश्रम की परिक्रमा की। भरत ने भगवान राम से उनकी चरण पादुका मांगी, जिसे सिर पर रखकर वे अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं।
इस दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने माताओं, राजा जनक और माता सुनयना से भेंट की।गुरुजनों और निषादराज को विदा करने के बाद भगवान राम ने देवताओं को भी उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हुए विदा किया। इसके बाद अत्रि मुनि ने भगवान राम की आरती की। उधर, अयोध्या पहुंचकर भरत ने राजसिंहासन पर भगवान राम की चरण पादुका स्थापित की और स्वयं राजमहल छोड़कर नंदीग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे। उन्होंने भगवान राम के लौटने तक तपस्वी जीवन बिताते हुए उनके नाम का स्मरण करने का संकल्प लिया। अंत में भरत की आरती के साथ रामनगर रामलीला में अयोध्याकांड का समापन हुआ।
इस प्रसंग में भाई-भाई के प्रेम, त्याग, मर्यादा और कर्तव्य के आदर्श को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। रामलीला ने संदेश दिया कि सच्चा प्रेम अधिकार में नहीं, बल्कि त्याग, सम्मान और समर्पण में निहित होता है।


