वाराणसी के रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में मंगलवार, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के अवसर पर रावण वध का मंचन किया गया। 230 वर्ष से अधिक पुरानी इस पारंपरिक रामलीला में श्रीराम और लंकापति रावण के बीच भीषण युद्ध का प्रसंग दिखाया गया। युद्ध के दौरान श्रीराम के बार-बार रावण के सिर और भुजाएं काटने के बावजूद उसका अंत नहीं हुआ।
रावण का वध न होने पर विभीषण ने श्रीराम को उसकी मृत्यु का रहस्य बताया। उन्होंने कहा कि रावण की नाभि में अमृत कुंड है, जिसके कारण वह बार-बार जीवित हो रहा है। इसके बाद श्रीराम ने अग्निबाण से रावण की नाभि में मौजूद अमृत को सुखाया और कई बाण चलाकर उसका अंत कर दिया। रावण के धराशायी होते ही रामलीला मैदान जय श्रीराम और हर-हर महादेव के जयकारों से गूंज उठा।
रावण वध के बाद श्रीराम के निर्देश पर विभीषण ने उसका अंतिम संस्कार किया। वहीं, विजयादशमी की रात करीब साढ़े दस बजे रामनगर के लंका मैदान में रावण के विशाल पुतले का दहन किया गया। इस दृश्य को देखने के लिए मैदान में बड़ी संख्या में लोग जुटे। रामलीला के इस प्रमुख प्रसंग के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया गया।


