भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्तर्गत चित्त को जानने की क्षमता,चेतना का कोई आदि अन्त नही है यह निरंतरता है।चित्त अनादिकाल से है।भारत वर्ष को आर्य देश कहते हैं आर्य बौद्धों की दृष्टि मे राग द्वेष,मोह,इर्ष्या से मुक्ति का मार्ग है।ये विचार सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में बुद्ध जयन्ती के उपलक्ष्य में श्रमण विद्या संकाय द्वारा "भारतीय ज्ञान परम्परा एवं भगवान बुद्ध" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ के कुलपति प्रो.वाङ्चुंग दोर्जे नेगी ने व्यक्त किया।
बतौर मुख्य वक्ता प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य प्रो राहुल राज ने कहा कि यह संस्था दर्शन का गढ है,भारत मे ज्ञान परम्परा अपने आप मे अति विशिष्ट और अविरल हैं।बुद्ध भी भारतीय ज्ञान परम्परा को स्वीकारते हुये कहते हैं कि यह बहुत प्राचीन है,धम्म का प्रकाशन कर अविरल धारा को प्रवाहित कर रहे हैं।यही सनातन है।यह प्रकाशित किया जा रहा है। बुद्ध ने सत्य को जानने पर बल दिया है यह साश्वत है।अखिल भारतीय स्तर के न्याय दर्शन के वरिष्ठ आचार्य एवं अध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो रामपूजन पान्डेय ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। पाली विभाग के आचार्य प्रो रमेश प्रसाद ने कार्यक्रम का संचालन किया। श्रमण विद्या संकायाध्यक्ष प्रो हरिशंकर पान्डेय ने बतौर संयोजक एवं धन्यवाद ज्ञापित किया।वैदिक मंगलाचरण-पाली और प्राकृत के विद्यार्थियों के द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप वेदाचार्य प्रो महेंद्र पान्डेय,सुधाकर मिश्र,हरिप्रसाद अधिकारी,प्रो रमेश प्रसाद,प्रो जितेन्द्र कुमार शाही आदि उपस्थित थे।
