हाईकोर्ट ने घरेलू हवाई किराए में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी पर कड़ी नाराज़गी जताई और सरकार व DGCA से जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि जब ₹4,000 वाला टिकट ₹30,000 तक पहुंच गया तो संबंधित मंत्रालय और नियामक संस्थाएँ क्या कर रही थीं?अदालत ने साफ कहा कि “बाजार को ‘फ्री-फॉर-ऑल’ नहीं बनाया जा सकता। जब एक एयरलाइन फेल होती है, तो उसका असर यात्रियों पर न पड़े, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।”इंडिगो की विफलता और अन्य एयरलाइनों की मनमानी पर नाराज़गीसुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इंडिगो की तकनीकी समस्याओं और फ्लाइट कैंसिलेशन ने यात्रियों को परेशानी में डाला, लेकिन उससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि दूसरी कंपनियों ने इसका फायदा उठाते हुए किराए को आसमान छूने दिया।
अगर इंडिगो फेल हुई तो बाकी एयरलाइनों ने ऐसा क्यों किया? और सरकार कहाँ थी? क्या कोई मॉनिटरिंग नहीं है?”कोर्ट ने एयरलाइंस की उस प्रणाली पर भी सवाल उठाए जिसमें मांग बढ़ते ही किराए को कई गुना बढ़ा दिया जाता है। अदालत ने कहा कि यह ‘नियंत्रक तंत्र की कमी’ और ‘उपभोक्ता संरक्षण में चूक’ का मामला है।याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि एयरलाइंस ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ के नाम पर यात्रियों से अनुचित वसूली कर रही हैं, खासकर त्योहारी सीजन और अचानक बढ़ी मांग के दौरान।हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, DGCA और प्रमुख एयरलाइनों को नोटिस जारी कर यह बताने को कहा है कि—एयरलाइंस के इस व्यवहार पर कोई रोक क्यों नहीं लगाई गई?यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए?क्या भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोकने की कोई नीति है?अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो वह किराए पर उच्चतम सीमा (cap) तय करने से जुड़े मुद्दे पर भी विचार कर सकती है।हवाई किराए को लेकर लंबे समय से यात्रियों की शिकायतें सामने आ रही थीं। हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी उन्हें राहत देने वाली है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अब मनमानी किराए पर अंकुश लगाने के लिए कार्रवाई हो सकती है।
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