कोलकाता: पश्चिम बंगाल में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर छिड़े ताज़ा विवाद ने राजनीति के साथ-साथ सामाजिक हलकों में भी गर्मी बढ़ा दी है। मुस्लिम समुदाय के कई समूहों ने साफ़ कहा है कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई व्यक्तिगत आपत्ति नहीं, लेकिन “जबरदस्ती गवाने की कोशिश” पर उन्हें ऐतराज़ है।कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों और स्थानीय संगठनों ने कहा—अगर हम ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाते तो इसका मतलब यह नहीं कि देशभक्ति कम है। हम भारत के नागरिक हैं, बांग्लादेशी नहीं कि हमें तुलना में लाया जाए। सम्मान ज़बरदस्ती से नहीं, दिल से आता है।”समुदाय के नेताओं ने बताया कि उनका विरोध गाने के खिलाफ नहीं, बल्कि इसे धर्म से जोड़कर राजनीतिक हथियार बनाने के खिलाफ है। उनका कहना है कि राष्ट्रभक्ति दिखाने के लिए किसी पर किसी विशेष गीत को थोपना उचित नहीं।
एक वक्ता ने कहा—वंदे मातरम् गाना हमारा व्यक्तिगत निर्णय है। हम चाहें तो गाएँ, न चाहें तो न गाएँ—लेकिन हमारी नागरिकता पर सवाल उठाना अपमान है।”राज्य के राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से भुना रहे हैं। विपक्ष इसे “सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास” बता रहा है, जबकि कुछ नेता इसे “राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न” कह रहे हैं।इसके चलते सोशल मीडिया पर भी बहस तेज़ हो गई है, जहाँ लोगों की राय दो धड़ों में बँटती दिख रही है।कोलकाता, मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना में इस मुद्दे को लेकर स्थानीय बैठकों और चर्चाओं का दौर चल रहा है। लोग चाहते हैं कि सरकार और राजनीतिक दल संवेदनशीलता बरतें और धार्मिक भावनाओं की आड़ में देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बाँटना बंद करें।फिलहाल राज्य सरकार ने किसी तरह की बाध्यता से इनकार किया है, लेकिन विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा। मुस्लिम समुदाय का साफ़ कहना है कि—हम भारत से प्यार करते हैं, यही हमारी मातृभूमि है। देशभक्ति हमारे दिल में है, गानों में नहीं मापी जा सकती।”
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