गुजरात में मकर संक्रांति का मतलब सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि रंग-बिरंगी पतंगों से सजा आसमान होता है। राज्य में पतंगबाजी की तैयारियां एक-दो महीने पहले से ही शुरू हो जाती हैं। इसी उत्साह के बीच बीते कुछ वर्षों से ‘टेरेस टूरिज्म’ का चलन तेजी से बढ़ा है, जो इस साल भी चरम पर नजर आ रहा है।अहमदाबाद के पोल, खाडिया और रायपुर इलाकों में मकर संक्रांति से पहले ही लगभग सभी ऊंची छतें बुक हो चुकी हैं। इन छतों का किराया इस बार 20 हजार रुपए से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच गया है। खासकर ओल्ड अहमदाबाद के इलाके पतंगबाजी के लिए सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं।
दरअसल, ओल्ड अहमदाबाद में रहने वाले बड़ी संख्या में लोग अब विदेशों में बस चुके हैं। मकर संक्रांति के मौके पर वे हर साल यहां लौटकर पतंगबाजी के साथ अपनी पुरानी यादें ताजा करते हैं। रायपुर इलाके में शहर का सबसे बड़ा पतंग बाजार भी है, जिसके चलते यहां की पतंगबाजी पूरे अहमदाबाद में मशहूर है।दिव्य भास्कर से बातचीत में पोल इलाके के निवासी अजय मोदी ने बताया कि इस साल उनके यहां पंजाब से एक परिवार आ रहा है, जबकि कई एनआरआई पहले से ही छतें किराए पर ले चुके हैं। उन्होंने बताया कि इस बार छतों का किराया 15 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक जा पहुंचा है।अजय मोदी के अनुसार, मेहमानों को सिर्फ पतंगबाजी ही नहीं, बल्कि पारंपरिक गुजराती व्यंजनों का भी आनंद दिया जाता है।
इसमें उंधियू-पूरी, जलेबी, भजिया, तिल की चिक्की, साथ ही मिनरल वाटर शामिल है। छतों पर बैठने के लिए सोफे-कुर्सियों की व्यवस्था की जाती है और बुजुर्गों व बच्चों के आराम के लिए दो कमरे भी उपलब्ध कराए जाते हैं।उन्होंने बताया कि टेरेस टूरिज्म से न केवल मकान मालिकों को फायदा होता है, बल्कि आसपास के छोटे व्यापारियों की भी आमदनी बढ़ती है। नाश्ते के स्टॉल लगाने वाले, पतंग और डोर बेचने वाले दुकानदार, और घरेलू उद्योग से जुड़ी महिलाएं—जो बाजरे के बड़े या अन्य स्नैक्स बनाती हैं—इन दो दिनों में 2,000 से 5,000 रुपए तक आसानी से कमा लेती हैं।मकर संक्रांति के साथ अहमदाबाद में टेरेस टूरिज्म अब सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला एक नया उत्सव बनता जा रहा है।

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