मुहर्रम का चांद दिखाई देने के साथ ही बुधवार से 1448 हिजरी इस्लामिक कैलेंडर का नया वर्ष शुरू हो गया। पहले मोहर्रम के अवसर पर शहर के इमामबाड़ों को सजाया गया और हजरत इमाम हुसैन की याद में मजलिसों व मातम का सिलसिला शुरू हो गया।चौक स्थित देश के प्रसिद्ध अजाखाना कराना-ए-अब्बास (मरहूम डॉ. मिर्जा हसन बेग) में पहली मजलिस आयोजित की गई, जो 9 मोहर्रम तक जारी रहेगी। मजलिस में डॉ. रजा बेग ने नौहाखानी की, जबकि मुर्तुजा शम्शी और अंजुमन हैदरी ने नौहा व मातम पेश किया।
इस अवसर पर शकील अहमद जादूगर ने बताया कि मुहर्रम के चांद के साथ ही अकीदतमंद काला लिबास धारण कर लेते हैं, जिसे दो माह आठ दिन बाद उतारा जाता है। उन्होंने बताया कि 3 मोहर्रम (19 जून) से जुलूसों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। 5 और 8 मोहर्रम को भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का परिवार परंपरा के अनुसार शहनाई पर मातमी धुन प्रस्तुत करेगा।
उन्होंने कहा कि इमामबाड़ों में हजरत इमाम हुसैन का ताबूत, अली असगर का झूला, जनाबे सकीना का कुर्ता समेत कर्बला के शहीदों से जुड़ी कई निशानियां मौजूद हैं। साथ ही जिला प्रशासन से मांग की कि मुहर्रम जुलूस मार्गों, विशेषकर दालमंडी क्षेत्र में सीवर और सड़क संबंधी समस्याओं का शीघ्र समाधान कराया जाए, ताकि अकीदतमंदों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।


