आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव के बीच रोजगार और शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, 2030 तक दुनिया की 22% नौकरियां AI और ऑटोमेशन से प्रभावित हो सकती हैं। वहीं, एचआर कंपनी टीमलीज का कहना है कि 40% कंपनियां अब नौकरी के लिए डिग्री के साथ AI टूल्स की जानकारी को भी जरूरी मान रही हैं। नैस्कॉम की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 82% बीसीए और एमसीए ग्रेजुएट्स के पास AI टूल्स की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि आईटी, कानून, कॉमर्स, ट्रांसलेशन, डिजाइन और लाइब्रेरी साइंस जैसे क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए AI स्किल अब आवश्यकता बनती जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में उन्हीं कर्मचारियों की मांग अधिक होगी जो AI टूल्स का उपयोग कर अपनी उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम होंगे। आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू ने भी कहा है कि AI सीधे लोगों की जगह नहीं लेगा, लेकिन AI का इस्तेमाल करने वाले लोग उन लोगों की जगह ले सकते हैं जो इस तकनीक को नहीं अपनाते। इस बीच चीन ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं। 2021 से 2025 के बीच वहां 12,200 से अधिक अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम बंद या निलंबित किए गए, जबकि लगभग 10,200 नए कार्यक्रम शुरू किए गए। इनमें AI, सेमीकंडक्टर्स, रोबोटिक्स और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़े कोर्स प्रमुख हैं।
भारत में भी बदलाव की शुरुआत दिखाई दे रही है। कर्नाटक सरकार ने 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए सरकारी कॉलेजों में 458 बीए, बीएससी और बीकॉम कॉम्बिनेशन बंद कर दिए हैं, जबकि 1,300 से अधिक कोर्सों में सीटें घटा दी गई हैं। हालांकि, OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन का कहना है कि AI के कारण दुनिया में बड़े पैमाने पर नौकरियों का संकट नहीं आएगा। उनके अनुसार, तकनीक रोजगार के स्वरूप को बदलेगी, लेकिन नई संभावनाएं भी पैदा करेगी।


