पश्चिम बंगाल में नई बीजेपी सरकार द्वारा पेश किए गए पहले बजट के बाद मिड-डे मील योजना में बड़े बदलाव का ऐलान किया गया है। सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत कोलकाता नगर निगम (KMC) क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने और परोसने की जिम्मेदारी धार्मिक संस्था इस्कॉन (ISKCON) को सौंपने का प्रस्ताव रखा है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद बच्चों को पूरी तरह शाकाहारी भोजन दिया जाएगा और मेन्यू से अंडा हट जाएगा। इस फैसले को लेकर राज्य में राजनीतिक विवाद तेज हो गया है।
नई नीति के तहत प्राथमिक विद्यालयों में प्रति छात्र भोजन की सामग्री लागत 6.78 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये कर दी गई है। सरकार का कहना है कि इस्कॉन को अपनी रसोई और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं तैयार करने में एक से दो महीने का समय लगेगा, जिसके बाद योजना की शुरुआत की जाएगी।
विपक्ष ने इस फैसले का विरोध करते हुए सरकार पर बच्चों पर शाकाहार थोपने का आरोप लगाया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि बंगाल में अंडा और अन्य पशु प्रोटीन लंबे समय से बच्चों के भोजन का हिस्सा रहे हैं और इन्हें हटाना उनकी पोषण संबंधी जरूरतों के साथ-साथ स्थानीय खान-पान की परंपरा के भी खिलाफ है।
टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि मिड-डे मील से अंडे हटाने से बच्चों के पोषण पर असर पड़ेगा और यह शाकाहार थोपने जैसा कदम है। वहीं विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि इस्कॉन बच्चों को स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराएगा तथा किसी को किसी धार्मिक आस्था को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने भी सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि संतुलित शाकाहारी भोजन बच्चों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। उनका कहना है कि दुनिया भर में करोड़ों लोग शाकाहारी भोजन के साथ स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और पोषण के लिए अंडा अनिवार्य नहीं है।
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