विश्व पर्यावरण दिवस से ठीक पहले जारी एक रिपोर्ट ने देश में बढ़ते जलवायु संकट की गंभीर तस्वीर पेश की है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 भारत के इतिहास का आठवां सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। इस दौरान औसत तापमान 1991-2020 के दीर्घकालिक औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।
रिपोर्ट में बताया गया है कि जनवरी से मई तक का मौसम सामान्य से अधिक गर्म रहा। खासकर सर्दियों में 1.17 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो वर्ष 1901 के बाद यानी 124 वर्षों में सबसे अधिक वृद्धि है। जून से सितंबर के बीच तापमान सामान्य से 0.09 डिग्री अधिक रहा, जबकि अक्तूबर से दिसंबर के दौरान यह सामान्य से 0.10 डिग्री कम दर्ज किया गया। देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 21 में 24 घंटे के अधिकतम तापमान के मासिक रिकॉर्ड टूट गए। वहीं, 21 राज्यों में 124 वर्षों बाद एक दिन में हुई सर्वाधिक वर्षा के नए रिकॉर्ड बने।रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत 99 प्रतिशत दिनों तक किसी न किसी रूप में चरम मौसमी घटनाओं का सामना करता रहा। इन चरम मौसमीय घटनाओं के कारण 4,421 लोगों की मौत हुई और 1.74 करोड़ हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य को मार्च की शुरुआत में ही गंभीर हीटवेव का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट में किसानों के लिए भी चिंता जताई गई है, मार्च और अप्रैल में खेती के लिहाज से अधिक जोखिम वाले महीने बनें। बढ़ता तापमान, अधिक नमी, अनियमित बारिश और ओलावृष्टि फसलों को नुकसान पहुंचा रही है।सीएसई और डाउन टू अर्थ द्वारा सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।
सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि आंकड़े भविष्य की कार्रवाई की दिशा तय करते हैं और जलवायु संकट से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। जन स्वास्थ्य के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ की स्थिति सबसे खराब पाई गई। वहीं, गोवा, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, केरल और सिक्किम शीर्ष-5 राज्यों और दिल्ली शीर्ष केंद्रशासित प्रदेश बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहे।
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