नागरी प्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस समारोह के दूसरे दिन साहित्य, संस्कृति और कला का अनूठा संगम देखने को मिला। मुख्य अतिथि बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने प्रदर्शनी एवं कला वीथिका का उद्घाटन करते हुए कहा कि साहित्य के उत्थान में नागरी प्रचारिणी सभा का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा कि सभा की इस ऐतिहासिक इमारत की एक-एक ईंट हिंदी सेवियों के समर्पण और योगदान की साक्षी है।प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय और नागरी प्रचारिणी सभा को मिलकर बड़ी परियोजनाओं पर कार्य करना चाहिए। दोनों संस्थानों के संग्रहालयों में उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों, हस्तलेखों और कलाकृतियों की प्रतिकृतियां एक-दूसरे के पास संरक्षित होनी चाहिए।
भारत कला भवन के निदेशक श्रीरूप राय चौधरी ने घोषणा की कि प्रदर्शनी के लिए सभा को भेजी गई चित्रकृतियां अब स्थायी रूप से नागरी प्रचारिणी सभा को भेंट की जा रही हैं। प्रदर्शनी में चित्रकार शैलेंद्रनाथ डे, रामगोपाल विजयवर्गीय सहित मुगल शैली की दुर्लभ चित्रकृतियां आकर्षण का केंद्र रहीं। भारत कला भवन के उपनिदेशक डॉ. निशांत ने बंगाल शैली की चित्रकला और संग्रहालय में सुरक्षित दुर्लभ साहित्यिक धरोहरों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
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इस अवसर पर कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत द्वारा लिखित पुस्तक 'काशी के कुशवाहा कांत' का लोकार्पण भी किया। इससे पूर्व उन्होंने आर्यभाषा पुस्तकालय परिसर में 'प्रतिपदा' कला दीर्घा तथा 'पावस' शीर्षक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। अतिथियों का स्वागत सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने किया।
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सायंकाल आयोजित संवाद सत्र में कमलेश किशोर सिंह 'ताऊ', आसिफ खान 'खान चा', कुलदीप मिश्र 'सरदार' और अतुल तिवारी ने युवाओं के साथ विचार साझा किए और उनके सवालों के जवाब दिए। वहीं डॉ. हिमांशु बाजपेयी और डॉ. प्रज्ञा ने 'काशी और कबीर' विषय पर दास्तानगोई प्रस्तुत की। सांस्कृतिक संध्या में संस्कृति वाहने और प्रकृति वाहने ने सितार-संतूर की मनमोहक जुगलबंदी प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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