वाराणसी। धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में 14 दिनों के अनवसर (विश्राम) के बाद भगवान जगन्नाथ ने मंगलवार सुबह भक्तों को दर्शन दिए। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर हुए विशेष जलाभिषेक के बाद परंपरा के अनुसार भगवान अस्वस्थ माने गए थे। इस दौरान प्रतिदिन काढ़े का भोग अर्पित किया जाता रहा। स्वास्थ्य लाभ के बाद आषाढ़ अमावस्या के अवसर पर सुबह 5 बजे मंदिर के कपाट खोले गए और श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन किए।
मंदिर के प्रधान पुजारी राधेश्याम पांडेय ने भगवान जगन्नाथ का सफेद वस्त्र और सफेद पुष्पों से विशेष श्रृंगार कराया। पंचामृत का भोग अर्पित कर भव्य आरती की गई तथा प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। इस अवसर पर भगवान को परवल के जूस का भी भोग लगाया गया। बुधवार को भगवान की डोली नगर भ्रमण के लिए निकलेगी, जबकि 16 से 18 जुलाई तक आयोजित रथयात्रा मेले में भगवान रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
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काशी के इस प्राचीन जगन्नाथ मंदिर का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। बताया जाता है कि पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ब्रह्मचारीजी का तत्कालीन पुरी नरेश से विवाद होने के बाद वे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिरूप प्रतिमाओं के साथ काशी आकर अस्सी घाट के निकट रहने लगे। बाद में उन्हें स्वप्न में भगवान ने काशी में मंदिर निर्माण का निर्देश दिया, जिसके बाद यहां मंदिर की स्थापना हुई।
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मंदिर की पूजा-पद्धति आज भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुरूप संपन्न होती है। परिसर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं के अलावा भगवान नरसिंह और भक्त प्रह्लाद की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है। लगभग 16 मीटर ऊंचे मुख्य शिखर वाले इस मंदिर के चारों कोनों में कृष्ण, राम पंचायतन, कालियामर्दन और लक्ष्मीनारायण सहित वैष्णव स्वरूपों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। तीन प्रवेश द्वारों वाला मंदिर परिसर अपनी विशिष्ट संरचना और कॉरिडोर जैसी बनावट के कारण भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
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