केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने देशभर में NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में कथित खामियों को लेकर 50 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। प्रधान ने सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि उन्होंने छात्रों के भविष्य और देशहित को ध्यान में रखते हुए पद छोड़ा है ताकि कोई "राष्ट्रविरोधी ताकत" इस मुद्दे का फायदा न उठा सके।
28 साल पहले पेपर लीक आंदोलन से मिली पहचान
धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक जीवन की शुरुआत भी पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन से ही हुई थी। वर्ष 1997 में ओडिशा में कांग्रेस सरकार के दौरान परीक्षा प्रश्नपत्र लीक का मामला सामने आया था। उस समय उत्कल विश्वविद्यालय के छात्र और ABVP के राष्ट्रीय सचिव रहे 28 वर्षीय धर्मेंद्र प्रधान ने करीब 1,500 छात्रों के साथ भुवनेश्वर सचिवालय का घेराव किया।
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प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें कई फ्रैक्चर आए। उनके साथियों के अनुसार उस आंदोलन के दौरान उन पर जानलेवा हमले भी हुए थे। यही आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ बना।
छात्र राजनीति से केंद्रीय मंत्री तक
18 वर्ष की उम्र में छात्र राजनीति से जुड़े धर्मेंद्र प्रधान 1994 से 1997 तक दो बार ABVP के राष्ट्रीय सचिव रहे। 1997 के आंदोलन के बाद वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। संगठन क्षमता के दम पर उन्होंने ओडिशा में भाजपा को मजबूत किया और बाद में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल हो गए।
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उन्होंने केंद्र सरकार में पेट्रोलियम, इस्पात, कौशल विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। जुलाई 2021 में उन्हें देश का शिक्षा मंत्री बनाया गया, जहां उन्होंने नई शिक्षा नीति और विभिन्न शिक्षा सुधारों पर काम किया।
इस्तीफे पर क्या बोले धर्मेंद्र प्रधान?
इस्तीफे के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उनका उद्देश्य हमेशा यह सुनिश्चित करना था कि परीक्षा माफिया किसी योग्य छात्र का भविष्य खराब न कर सके। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से वे बेहद दुखी हैं और यह उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य का सवाल है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने छात्रों को गुमराह कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उन छात्र आंदोलनों के बाद आया है, जिनमें शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग प्रमुख रही।
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